पक्षी तू कब उड़ेगा
सब कुछ लुटा कर लुट कर हीं उन्हें पाया जा सकता हैं
पर हम न लुटने को तैयार हैं
न लुटाने को
हम तो मुक्ति के रास्ते पर भी समेट समेट कर चल रहे
और बात करते प्रेम और भक्ति की उनकी सेवा की
पहले अपनी ही सुख सुविधाओं से मुक्त न है हम
यह पिंजर जीव और इसका शरीर पिंजरा का कितना ख़्याल है
पिंजर पँक्षी तभी उड़ान भरेगा जब उसका पिंजरा खुलेगा
यह शरीर और हम एक नहीं हैं
हम क़ैद इस शरीर रूपी पिंजड़े में
शरीर नाशवान की कितनी देखभाल कितना श्रृंगार ..
इस शरीर के सम्बंधी से कितनी आत्मियता
जब तक यह सब प्रपंच में मन फँसा
आप कहाँ मुक्त हो
आप व्यवहार निभा रहे अध्यात्म में भी बस ..
शरीर को महत्व न दीजिए बस जो सेवा वे लेना चाहेंगे आपके शरीर द्वारा फिर वे वैसी स्थिति भी देंगे
स्वास्थ्य या बिमारी सब कृपा उनकी
उनकी वस्तु हैं
उन्हें इस्तेमाल करने दीजिए
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