प्रेम बोध
*प्रेम ..बोध*
अजीब है प्रेम का अनुभव सखी....
"प्रेम परम संतोष भी...उतनी ही प्रेम में व्याकुलता भी..
.प्रेम में आशा भी उतना ही त्याग भी...
ओह सखी...जिधर प्रेम है उधर तो मात्र प्रेम ही है...भाव तो आनी..जानी है...
जैसे सागर में सागर ही स्तिथ है...उससे उठने वाली उसकी लहरें ही आनी..जानी है...
लहरें न हो तो सागर का किलोल समझ न आवे...यह उसकी सुन्दरता और अस्तित्व को स्पष्ट करता है...
ठीक ऐसे ही हृदयस्थ भाव ही प्रेम की लहरें है जो उसके अस्तित्व को और उसके सौंदर्यबोध का बोध कराता है...
श्री हरिदास
🙏🌷🌷
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