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लज्जा और श्रृंगार

*लज्जा और श्रृंगार* श्री प्रिया की लज्जा ही श्री प्रिया का श्रृंगार है सखी .. फिर श्रृंगार क्या ?? अनंत लज्जाए जो श्री प्रिया को श्री सखियाँ धारण कराती हैं  जानती हो क्यों ?? हित हेत हित के हित हेत उनकी हितैषी हित अलियाँ.. प्रीतम के कौतुक हेत प्यारी के विलसने हेत  प्रीतम के उलझने हेत प्यारी के सिहरने हेत  प्रीतम के रसोन्मत्त हेत प्यारी के रसप्रवाह हेत अनेक अनेक श्रृंगार रूपी लज्जाएँ धारण कराती पियप्यारी की हितैषी हित अलियाँ .. ये लज्जा यह श्रृंगार ही तो विलसने विलसाने का आमंत्रण हैं .. किस हेत?? रस मग्न होने हेत फ़ूल से गुलकंद होने हेत  रस से तरंग हो जाने हेत  रंग में राग हो जाने हेत लाड़ से लज्जा धारण कराती  पुनः लज्जा के निवारण हेत  हितमयी विल्सनो के निदान हेत .. श्री प्रिया की प्रियकारिणी श्री हित अलियाँ .. ये अलीयाँ ही श्रृंगार के रूप मे  प्यारी की हैं लज्जा वपु। श्री वृंदावन 🍀🙏🍀

अदृश्य प्रकट सत्ता

अदृष्य प्रकट सत्ता ••••••••••••••••• जो बाँधे न बँधे वह प्रेम .. जो रोके न रुके वह प्रेम ..   जो गति से परे पर जिसकी अवधि में सर्व गतियाँ ढरे वह प्रेम ..   जो समय से परे ..पर जिसकी स्पंदने ही काल (दशा ,दिशा ,योग) रचे ,वह  प्रेम ...  जो गर्भ है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का  सर्वत्र व्याप्त वह सत्ता अपने ही प्रसार का विस्तार वह प्रेम ..     जब प्रेम ही प्रेम तो फिर उसके लिए प्रेम ही एकमात्र नेम .. आप जितने प्रेमी हो    उतने ही ख़ुद ख़ुदा हो ..अपनी ही खुदी में ख़ुद को ढूँढ़े ..ड़ूबे  वह प्रेम ... प्रेम भी ढूँढे प्रेम  प्रेम ही ढूँढ़े प्रेम  प्रेम से ही रची प्रेम में ही बसी  प्रेम की बस्ती प्रेम     प्रेम का प्रेम ही प्रेम ..वह हैं प्रेम न देखे  न सुने  न चले  न छुए  फ़िर भी इनके अनुभव में आता है प्रेम  अद्भुत कौतुकी प्रेम  जिसकी उन्माद ही चाल हैं  विल्सन ही देखना सुनना और स्पर्श है इन्द्रियातीत यह प्रेम  फिर भी इंद्रियो में भरे  और रिसे यह प्रेम ..वह है प्रेम  अदृष्य ...