अदृश्य प्रकट सत्ता
अदृष्य प्रकट सत्ता
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जो बाँधे न बँधे वह प्रेम ..
जो रोके न रुके वह प्रेम ..
जो गति से परे पर जिसकी अवधि में सर्व गतियाँ ढरे वह प्रेम ..
जो समय से परे ..पर जिसकी स्पंदने ही काल (दशा ,दिशा ,योग) रचे ,वह प्रेम ...
जो गर्भ है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का
सर्वत्र व्याप्त वह सत्ता अपने ही प्रसार का विस्तार वह प्रेम ..
जब प्रेम ही प्रेम तो फिर उसके लिए प्रेम ही एकमात्र नेम ..
आप जितने प्रेमी हो
उतने ही ख़ुद ख़ुदा हो ..अपनी ही खुदी में ख़ुद को ढूँढ़े ..ड़ूबे
वह प्रेम ...
प्रेम भी ढूँढे प्रेम
प्रेम ही ढूँढ़े प्रेम
प्रेम से ही रची
प्रेम में ही बसी
प्रेम की बस्ती प्रेम
प्रेम का प्रेम ही प्रेम ..वह हैं प्रेम
न देखे
न सुने
न चले
न छुए
फ़िर भी इनके अनुभव में आता है प्रेम
अद्भुत कौतुकी प्रेम
जिसकी उन्माद ही चाल हैं
विल्सन ही देखना सुनना और स्पर्श है
इन्द्रियातीत यह प्रेम
फिर भी इंद्रियो में भरे और रिसे यह प्रेम ..वह है प्रेम
अदृष्य सत्ता पर सर्वत्र प्रकट यह प्रेम
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श्री राधा
🙏🌹🙏
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