युगल प्रेम रस रवानी

*युगल प्रेम रस रवानी*

(वर्षा ऋतु -कुंज केलि विलास)

सखी ,पावस ऋतु छा रही हैं और यह ऋतु सहज ही प्रेम की प्रसन्नता का ब्यार लेकर आती है।

   श्री वृन्दावन की हरी भरी भूमि देख देख ..कुंज निकुंजो का पुष्पों से लदा यौवन चातक ,पपीहे , मोरों इत्यादि पंक्षियों का मुदित कलरव और उनका इस ऋतु के आगमन पर उमंग भरा नृत्य ..
श्री घन दामिनी की चमक , धमक ..एवं वर्षा की  शीतल शीतल धीमी धीमी फुहार,श्री युगल के हृदय को केलि-कलोलित और अति प्रसन्न करती हैं।

सखी ,यह शरारती मतवाली  ऋतु दोनो के हृदय में प्रेम का मज्जन कर रही मानो..दोनो के स्नेह को अब केलि विलास में प्रकट करने आतुर ..यह प्रेमातुर वर्षा ऋतु।दोनों को पता ही नहीं चला कि कब धीरे से यह पावस ने उनमें मदन की सींचना कर दी हैं और रस विदग्ध नागर और रस प्रदायनी नागरी में राग मल्हार को उनमें प्रकट कर ..उनके स्नेह रस को और और उन्मादित करने लगा ..

   सखी ,फिर इस प्रेम रस रवानी में दोनो युगल फ़ूलने .. खिलने लगे ।क्या कहा जाए उनकी यह पावस प्रेम दशा .....युगल के मन अब मिलन को हर्षित हैं और उन्मत्त प्रेम अनुराग रस में भींजते जाते हैं ।प्रेम कौतुक लालजु , प्रसन्नमयी श्रीप्रिया जु के मुदित रूपरसास्व का पान कर ..कर और रस में भरते जा रहे हैं,और सखी जितना जितना रस मग्न होते उतने ही उतने रस विवश भी ..उनके भँवर समान मादक नयन श्री प्रियाजु के अमृत रूपी बदन कमल में फँस चुके थे और श्रीप्रिया के मीलित अधरों के स्वरूप का अवलोकन कर उनके रूप रस का पान कर रहे थे और ऊपर से पावस ऋतु का मदन प्रहार से व्याकुल किशोर अब धैर्यहीन हो ऐसा उपाय सोचते की और  प्यारी जू के अंग  संग में फँस जाए ...और फिर ..मनुहार करते मनुहारी लला ..

    लाल जु कहते श्रीप्रिया से “ हे प्यारीजु ! इस पावस ऋतु के आगमन से आप  अति प्रसन्न है और इस प्रसन्नता के कारण आपके श्री अँगो से दिव्यता प्रकट हो रही है । सुनिए प्यारी जु प्रसन्नता के इस स्नेह रस का अब बरसने का समय हैं और आपके बरसने की सभी बाट जोह रहे हैं।आइए श्री प्यारी क्यों न हम दोनों भी भीग भीग कर इस पावस का शुभ मनोरथ पूर्ण करे ..

   मुस्कुराई श्री नवेली प्रिया अपने श्री प्राण नवल किशोर की वाक्- चातुरी पर पर क्या सोच कर लजा गयी ...और अपने कुच कलशों पर निहारते  श्री मोहन जु के नैनों से छिपाने हेतु ढाँपने ..छिपाने लगी ..अपनी झीनी सी चुनरिया को तमाम प्रेम चुनौतियाँ के समक्ष करने कराने लगी और समेटने लगी .. दुराने लगी चुनरी से अमृत कलश के भारों को ..

   श्री रसिक लाल जी श्री रसीली प्रिया के इस कौतुक से ..अपने विश्राम स्थल मंडल को छुपते .. ढाँपते देख चतुर शिरोमणि कहते है , “हे ,उरजनि पिय परसिनी ..रंग बिहारिनि अनुराग सिंधे ..यह वर्षा की बूँद बहुत सुहावनी लग रही है और इनके कोमल कंपित कर देने वाली शीतल फुहार रोम रोम को रोमांचित कर रही हैं ऐसे में भीग भीग कर और क्यों न इस पावस प्रेम का हर्ष बढ़ायें ।परंतु प्यारी देखो आपकी यह चुनरी अति झीनी हैं ,प्रेम रूपी घन वर्षा में कही भीग न जाए सो इसे आप उतार दीजिए और मेरी छाती से छाती लग जाइए और इस प्रेम रस का वर्धन कर इस स्नेह रस का मान बढ़ाइए ।

   रिझवार प्रिया ..प्रेम के पदाधिकार का आद्यांत निर्वाह करने वाली ,श्री प्रियतम जु की सदैव हितैषी सदैव दान करने में उदार शीघ्र ही श्री मनहर को अपने सुभग अँगो से लगाकर स्पर्श दान देती हैं ..और इस दर्शन की लोभी सखियाँ आपस में कहती हैं “आज देखो सखी कैसे फ़ूल मे फूल खिल रहा हैं फ़ूल सिमट सिमट फल हो रहा है,और  अति आनंदित हो हो मनुहार करती हैं एक दूसरे से वृंदा सखी से ‘कि तन रूपी वृंदावन के अंग रूपी भूमि पर यह आनंद सदा बरसता रहे ..बरसता रहे ..’‘इस स्नेह मल्हार के छांव में मेरे युगल की प्रीति और और प्रवीन नवीन एवं पुलकित होती रहे ..होती रहे ..’

श्री वृंदावन
श्री हरिदास 🙏

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