ठान में मान

ठान में मान

     श्री प्रियाजु का हित हेत सुखद विलास
श्री लाडली जू के आकस्मिक एवं अकारण मान का अवलोकन करती कुशल सखी कहती, श्री प्यारी से :-

प्यारी तू अति श्यामा 
लाल उर अभिरामा..

नित्य सुख सदने प्रीतम प्रेम अनुकूले 
फिर काहे तू रूसने का स्वाँग रचे ..

जोई जोई प्यारों करे प्यारी सोहि तोहि भावे 
फिर व्यर्थ क्यों मान बढ़ावे ..

प्रीतम के हेत ,प्रीत के हित ,न्यारी तेरो यह है सब सुखद स्वाँग 
 
प्यारी तू अलबेली  बैठी मान कुंज में बिना सोच विचारे ..
तेरो मग जोवे लाल बिहारी राधा राधा अकुला -अकुला ,चिहारे ..

प्रेम की परिपाटी तुम जानो प्यारी 
करौ व्याकुलता का निदान ...
करहू कृपा दान प्यारी 
लियो कण्ठ लगाई अपनो प्राण सुजान ..

और करिहौ जो जो रुचै ,पर तजि दिजौ यह मान ..
तुम जीवन भूषण पिय की तुम ही निज प्राण ..

सुनत सुखद वचन कुशल सखी के 
श्री प्रिया में भरी प्रेम उड़ान ..
दौड़ी गईं कुसुम कुंज में  स्नेह रस भयौ और सुहान ..

स्नेह रस भयौ और सुहान
शीतल भये व्याकुल रसिक सुजान ..
पायो रस में रस ने सुखद विश्राम 
      रस का रस से शील निदान ...
              

मान का हेतु

प्रेम की वृद्धि स्वयं के लिए 
और प्रेम की सेवा प्रियतम हित हेतु 

जब प्यारी रूठने का स्वाँग करे तो सखियाँ और ज़्यादा श्री लाल जी के प्रति करूण हो जाती हैं ..
और प्यारी के समक्ष लाल जी के गुण गाने लगती है...
 जो की श्री प्यारी को अति रुचिकर लगता हैं प्रियतम का गुण सुनना और उनके बारे में सुनने से श्री प्यारी का प्रेम और और उफान लेता है और हृदय द्रवीभूत हो जाता है..

इस प्रेम वृद्घि से युगल का अति मंगल तो है ही साथ साथ सम्पूर्ण श्री विपिन का हित है 
श्रृंगार रस बढ़ने लगता हैं ।

मान विलास 
रसों  की वृद्धि का सुखद विलास 

श्री हरिदास

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