झरित श्रृंगार की वेदना

झरित श्रृंगार की विरह वेदना
       और उम्मीद का सुख

यह मजबूरियाँ हैं या मेरी चाहत की हार 

या सिर्फ़ एक ख़ुमारी का अहसास ..

हार भी गयी होती तो तसल्ली थी 

पर इधर तो और इशारों पर जमी मेरी कश्ती थी ..

ख़ाक हु मैं 

पर बुझने की सोचती रही 

चली ही कब थी ..

जो तुम तक पहुँचने की उम्मीद कर रही ..

पर यह उम्मीद ही तो सम्पूर्ण जीवन को किसी आस मे जी लेती है 

कि कभी तो मिलेंगे ..

कभी तो खिलेंगे ..

कभी तो वे अपनाएँगे  ...

फिर उन्हें हम जिएँगे ..

कोई न कोई श्रृंगार बन कर उनका फिर खिलेंगे ..फिर महकेंगे 

पुनः मिलेंगे.. पुनः सजेंगे ..


एक झरित श्रृंगार
श्री हरिदास

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