सखी तुम

सखी तुम

सखी  तुम ,युगल सुख से ,युगल संगिनी कहलाती हो

एक दूजे के मन की
सखी बात हो तुम ..
विभास हो तुम बिहार का विहाग हो तुम 
प्रेम विलास बुन बुन 
उन्हें नित्य नव नव उमंग उत्स धराती तुम 
नय नव श्रृंगारों को लेकर ,सखी तुम उन्मे श्रृंगार विलास जगाती हो 

सखी  तुम ही बसंत तुम ही पावस ,
केलि कलाओं के विकास विलास हेतु नाना भाव हो कर आती सखी तुम ..
युगल उन्मादिनी ,श्री युगल का उन्माद बढ़ाती तुम ..
तुम ही पावस तुम ही शरद 
 तुम ही नव नव तरुण पल्लव में खिली कुमुदिनी कहलाती ,
तुम ही सुगंधा तुम ही राग ,प्रेम केलि के कोक कलाओ से उनका सुहाग सजाती ..सखी तुम 

तुम बहती हो उनसे सेवा होकर ,अनुराग राग होकर ,उनका मज्जन विलास होकर वृंदावन की ओर....

  और फिर तुम ,झरती अनुग्रहित चूर्णिका ..पुनः वृंदावन से नवीन और नवीन रसमयी सेवा बन कर..आती सखी तुम ...
उनका नवीन विलास बन कर झूमती संग संग उनके तुम ..

श्री वृंदावन का निभृत चिंतन हो तुम ,प्रेम रोगन सुरभित सुगंधित उपचार होतीं हो ,सखी तुम ..
युगल संगम के प्रेम झरन की उज्जवल ओस की बूँदे हो ,सखी तुम..

उनका सघनतम से सघनतम संग हो तुम...
जिस तन पर वे गमन करते है वह वन हो तुम...
युगल रस रसायन हो सखी तुम 
 निभृत संग निभृत रस हो तुम...

श्री हरिदास

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