नील नील और उज्ज्वल
नील नील और उज्ज्वल
प्रेम गगन में युगल मगन
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(मल्हार विलास )
नीले नीले प्रेमाकाश में उज्ज्वल चमकते प्रीती के बदरा
घूम रहे उमंग में प्यार में बरस जाने को
नील मे सफ़ेद धवल यह रंग हैं
उसके अपने ही प्यार का
अपने प्यार में बिखर बिखर फिर सिमट
सिमट कर बिहरने का
इसके बिहार काल में जो प्रेम की
ध्वनि फूट पड़ती हैं स्वतः
वह मिलन के आनंद की गरजना हैं
घन से प्रकट दामिनी है ..
प्रेम ऊर्जा है मिलन की ..
बिहरण काल बदरा का अपने नील आकाश में
चमकना ..गड़गड़ाहट ..इसके प्रेम के
भार में स्पंदित ,प्रेम आंदोलन में झूमना है
प्रेम समारोह से आंदोलित होती हुई बदरा
प्रेम की उत्तरेक दशा में मचलती
हुई ,
जो स्नेह मदन रस सम्भाल न
पाती वह अतिरेक विलास की बूँद
पावस रस हो हो कर धरा पर बरस जाती है ..
बरस जाती है ...
यह पावस विलास लेकर घनदामिनी धरा पर आती है
और और विलसित विलास को विलसाने के लिए
सम्पूर्ण प्रेम हुलास में हुलसित और हुलसाने के लिए
उज्जवल बदरा श्री प्रिया बरस जाती है
अपने श्याम को सम्पूर्ण विलास मे भिगाने डुबाने हेतु ...
और बरस कर स्वयं और विलास रचना हेतु काँपती इस रस वर्षण से प्रियतम में आलिंगन बद्ध हेतु और और रस वर्षण प्रियतम सुख हेतु ...
मदन रंगन हेतु ..श्री प्रिया .!!!
श्री वृंदावन
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