प्रेम सिद्धांत

प्रेम सिद्धांत

 (प्रेम की देहरी पर प्रेम ही रहता है)

प्रेम की तहज़ीब वो न समझे 

   हम ढूँढते रहे गहराइयाँ 
वे लफ़्ज़ों से चंद अल्फ़ाज़ खेल गये ......प्यासे को मतलब ही क्या पात्र के चमक से ..उसे तो पात्र की गहराई चाहिए अपनी हलक को गीला रखने के लिए ..

   सखी ,प्रेम की सेवा में सिद्धांत भी बाधा नहीं बनता ..स्वयं  गल जाता जिधर प्रेम स्पष्ट हो जाता ..

प्रेम भीतर से उछला प्रेमास्पद पर रँगीला रसीला गीला मधु लेपन है , सो सिद्धान्त सिद्धान्त केवल स्थूलता को गलित करना चाहता । जो नित्य सहज गलित है वहाँ प्रेम है , और प्रेम का सिद्धांत है प्रेम उल्लास का उत्सवित विलास मात्र । 

सारे सिद्धांत - मार्ग प्रेम तक पहुँचाने के लिये ..प्रेम देहरी पर तो प्रेम ही रहता हैं , साधना प्रेम की ओर की यात्रा है , प्रेम की अपनी साधना में प्रेम का सेवा - सुख होकर वर्द्धन ही है ।

सखी,प्रेम का न कोई गुरु न कोई शिष्य प्रेम में न शिष्टता न विचार 
प्रेम में बस प्रेम भरा अहसास ,
प्रेमी सिर न झुकाता अपने यार के दर पर ,उसे तो नज़र मिलाना ही रास आ गया ,नज़र मिल जाये और हम याद रह जाए 
यह तो तौबा हैं ,फिर क्या प्रणाम क्या निवेदन जब उधर न कोई दूज़ा हैं 

हाँ फिर कह दूँ ....

 प्रेम की देहरी पर सिर्फ़ प्रेम रहता हैं

🌷 श्री हरिदास🌷

Comments

Popular posts from this blog

प्रेम बोध

पक्षी तू कब उड़ेगा

रोग कृपा