न हम न तुम
*कि न तुम न हम*
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सोचते सोचते हम तुम हो गये
तुम हम हो गए
डूबे इतने की न तुम न हम
एक अहसास भी न रह गए
शेष शेष
मात्र प्रेम रह गये
डूबा तो स्वयं को प्रेम पाया
न तुम न हम
प्रेम हीं हम प्रेम ही तुम ..
प्रेम में सिवाए सोचने के हैं क्या
नयन में नयन देख सोचते हैं
अधर अधर भी मिल कर सोचते हैं
रोम रोम उलझ उलझ कर सोचते हैं
सोचते हैं
मिलते हैं
और सोचते हैं मिलते हैं
और और अपने प्रेम वपु में खोते हैं..
सुन री सखी ..
तुझसे ज़्यादा सँग यह तेरा ख़्याल है
तुम थे साथ उससे और पास यह तेरा ख़्याल है...
*श्री हरिदास*🙏🌷
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