जननी को पीड़ा

🙏श्री कुंज बिहारी श्री हरिदास 🙏

             जंननी को पीड़ा 
                     और
               जीव को भय

जननी को भय न हैं 
भूमि को भय न हैं 

कारण सखी ..

क्योंकि उसे पाने की नहीं 
पर न दे पाने की पीड़ा हैं 
न खिला पाने ,न महका पाने की ,न विकसित कर पाने की पीड़ा हैं ...
 अपना अमृत न पिला पाने की पीड़ा हैं ..
यह पीड़ा को ही तृषा कहते हैं 
यही मूल पीड़ा हैं 
   इसे आध्यात्मिक पीड़ा ही समझे 
यह जीव के जननी होने का प्रमाण हैं 
उसके शुद्ध अस्तित्व का प्रमाण हैं 

जननी हीं प्रेम कर सके 
जननी ही स्नेह का पोषण का सके 

जीव का जननी हो जाना 
उसकी आध्यात्मिक उच्चतम गति है 
आगे के विकास के लिए 
आत्म विलास मे विकसित होने के लिए 

जो जीव जननी हुआ है 
वह ही सहज सेवायत हैं 
क्योंकि सेवा उसका मात्र स्वरूप रह गया
यह सुंदर सेवा मार्ग सेव्य में लीन कर देता है
पर सेवा सिर्फ़ जननी जाने 
जीव उसकी नक़ल कर सके 
सेवा की ...

जय जय मम जननी श्री ललिते ..
🙇‍♀️🙏🌷

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