सहज हो कर भजन बने

सहज हो कर ही भजन बने

माई री सहज जोरि प्रगट भई.....

 सहजता में सहज जोरि प्रकट है,
सहज ही होवे तो सहज जोरि हृदय में प्रकट होवे ...

जो सहज हैं वह ही सहचरी हो सके।असहज हृदय में कैसे सहज जोरि का सुखवास हो ..
निश्चित वे सभी में सभी उनमे ,पर उनकी मिठास का अनुभव तो सहज होने पर  ही बने ,सहज को सब सहज है।

  असहजता जीवात्मा का स्वभाव । सहचरी को तो हर हाल सतर्क रहना है सहज रहना है उनके उत्सव सेवा हेतु 

सहज होकर भजन रंगने लगता हैं 
और असहज स्थिति भजन को ही चौपट कर देती है।सबसे बुरा संग स्वयं हमको हमारा है।मन बुद्धि में अन्य का दोष दर्शन ,यह कुसंग हैं 
और सिर्फ़ मात्र प्यारी प्यारे की बातों में रुचि रखना यह ही सत्संग है।

जिधर प्रिया प्रियतम की चर्चा कम और मैं की प्रस्तुति अधिक है वह कुसंग ही है।

श्री वृंदावन

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