*प्रेम ..बोध* अजीब है प्रेम का अनुभव सखी.... "प्रेम परम संतोष भी...उतनी ही प्रेम में व्याकुलता भी.. .प्रेम में आशा भी उतना ही त्याग भी... ओह सखी...जिधर प्रेम है उधर तो मात्र प्रेम ही है...भाव तो आनी..जानी है... जैसे सागर में सागर ही स्तिथ है...उससे उठने वाली उसकी लहरें ही आनी..जानी है... लहरें न हो तो सागर का किलोल समझ न आवे...यह उसकी सुन्दरता और अस्तित्व को स्पष्ट करता है... ठीक ऐसे ही हृदयस्थ भाव ही प्रेम की लहरें है जो उसके अस्तित्व को और उसके सौंदर्यबोध का बोध कराता है... श्री हरिदास 🙏🌷🌷
सब कुछ लुटा कर लुट कर हीं उन्हें पाया जा सकता हैं पर हम न लुटने को तैयार हैं न लुटाने को हम तो मुक्ति के रास्ते पर भी समेट समेट कर चल रहे और बात करते प्रेम और भक्ति की उनकी सेवा की पहले अपनी ही सुख सुविधाओं से मुक्त न है हम यह पिंजर जीव और इसका शरीर पिंजरा का कितना ख़्याल है पिंजर पँक्षी तभी उड़ान भरेगा जब उसका पिंजरा खुलेगा यह शरीर और हम एक नहीं हैं हम क़ैद इस शरीर रूपी पिंजड़े में शरीर नाशवान की कितनी देखभाल कितना श्रृंगार .. इस शरीर के सम्बंधी से कितनी आत्मियता जब तक यह सब प्रपंच में मन फँसा आप कहाँ मुक्त हो आप व्यवहार निभा रहे अध्यात्म में भी बस .. शरीर को महत्व न दीजिए बस जो सेवा वे लेना चाहेंगे आपके शरीर द्वारा फिर वे वैसी स्थिति भी देंगे स्वास्थ्य या बिमारी सब कृपा उनकी उनकी वस्तु हैं उन्हें इस्तेमाल करने दीजिए
रोग एक बहुत बड़ी कृपा हैं क्योंकि स्वयं के सुख भोगने की इक्षा ही समाप्त हो जाती है कमजोर इंद्रियाँ ,दुर्बल शरीर में क्षमता ही कहाँ रहती है कि उसका मन उस और भागे बलिहारी मेरे सरकार की जो इस रीति से मेरे मन पर लगाम है लगायें जय जय श्यामा श्याम 🙏🌹
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