गुरु कृपा प्रसादी

गुरु कृपा प्रसादी
                भाव प्रकाश 

गुरु द्वारा प्रदत्त नाम को जब आप गहराई में लेकर नाम के साथ एकाकार हो कर अंदर ही अंदर हृदय से रटने लगते है ..नाम सहारे गहराई में उतरते हैं 
तब सिर्फ़ एक गुरु तत्व की अनुभूति होती है।

अंदर का मौन ही सत्य अनुभवित होने लगता हैं ।इंद्रियो से देखी सुनी कही सब स्वप्न वत अनुभव होने लगती हैं ।
जब तक ऐसा बोध अनुभव नहीं होता आप अपने अंदर के प्रेम को पहचान नहीं सकते ...

गुरु तत्व के बोध के उपरांत प्रेम तत्व की अनुभूति है।प्रेम बिन ज्ञान ठहर नहीं पाएगा ..रिस जाएगा ...

आत्मनुभूति के बाद प्रेमनुभूति अनिवार्य हैं चेतना के पूर्ण विकास हेतु ।जब तक हृदय करुणावान  बुद्धी सम नहीं होती 
माया के साथ राग द्वेष का बंधन बना ही रहेगा ।
    इसीलिए प्रेम सर्वोपरि लक्ष्य हैं प्रेम ही सेवा और साधन हैं प्रेम ही नियम और तप है।क्योंकि प्रेम की अनुभूति पश्चात जगत में हमारा  द्वैत ठहरता ही नहीं ।

     प्रेमी संग में भी एकांत हैं इसीलिए वह शांत चित समवान हुआ अपने हृदय बिहारी से निरंतर एक़रस एकरंग हुआ मिलन का अनुभव करता है।यह प्रेमनुभूति अति मिठास से भरपूर अकारण सुख आनंद प्रदायिनी है।
   इसके स्वाद जिसने गुरु आशीष से चख लिया उसके इंद्रियगत स्वाद सुख लेने की लालसा ख़त्म हो जाती है ।जीव लालसा का नष्ट होना ही नाम कृपा हैं और युगल सेवा की लालसा का लोभ उदय होना ही वास्तविक गुरुपूर्णिमा का उद्देश्य श्री सदगुरु देव जू की पूर्ण कृपा हैं 

जय जय 
सद्गुरू सरकार जू

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