मान का कारण भी रस अतृप्ति

मान का कारण भी रस अतृप्ति

आश्चर्य है कि पूर्ण प्रेम अतृप्त ही रहता है ..यह अतृप्ति ही प्रेम को नवीन रखती है नव नव रूप , श्रृंगार , और रसमयी केलियों के लिए ललायित रखती है और सखी इसी रस की वृद्धि  हेतु  प्रेम में सहज मान प्रकट रहता है ,रस पोषण हेतु रूठ रूठ कर और रसीला रसायमान हो जाना यह धीर प्रेम की  चंचल गति है ...

श्री वृंदावन

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