प्रेम रुस

प्रेम रूस

प्रेम की विचित्रता तो देख सखी 
   इधर रूठा भी उसी से जाता जो उनके प्रेम में अधीन हुए बैठे हैं ।
   सच कहती हो जिधर अपनापन होगा उधर ही मान का स्वाँग होगा ..स्वाँग अर्थात लीला 
ओह यह प्रेम भी न बहुत चतुर है अपने रस पोषण हेतु सब ज्ञान रखता है।
 
  तभी तो प्रेम उधर ही झुकता है, जिधर उसे अपने लिए पूर्ण समर्पण दिखता है।
प्रेम का न्योछावर तो प्रेम ही है सखी ..जो अधीन हो चुका है..हरा जा चुका है ..हर लिया गया है ..सखी वह ही तो प्रेम का खिलौना है
   खिलौना ही तो अधीन रहवे न सखी 
और जो अधीन है ..उन्ही से सहज अपनापन है और अपने से ही रूठने में आनंद भी और अपनेपन का भावपोषण भी ...

श्री हरिदास🌺🙏🌺

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