प्रेम जीवंत
प्रेम जीवंत
प्रेम तो है
पर प्रेम तभी जीवंत होता हैं जब उसमें केलि हो
प्रेम किलोल से ही प्रेम जीवंत होता है
गौर श्याम तभी सुखी होते जब उनकी प्रेम भुज लताएँ परस्पर आबद्ध रहती हैं
प्रेम से प्रेम का स्पर्श और और मीठा सघन और और आलोडित प्रमोदित प्रफुल्लित रसीला होता जाए यह ही प्रेम की रुचि और प्यास है अपनी इस चाह को प्रेम अनंत सखियाँ अनंत कुंजे अनंत विलास में रच देता है।
यह सृष्टि प्रेम का ही तो विलास है।
प्रेम जीवंत ही विलास में होता है।
इसीलिए यह बिहार और विलास प्रेम का अभंग अंग हैं ,प्रेम की सम्पूर्णता है
जो सिर्फ़ युगल रस के प्रेमी उपासक प्रियाप्रीतम के कृपापात्र ही अनुभव कर सकते हैं
अन्य के बस मे न यह अद्भुत परा ज्ञान ,प्रेम के वश में सब कोई
पर प्रेम किसी के वश में नहीं
प्रेम की कृपा प्रेमसहेली ही प्रेम की सेवा कर सके समझ सकती है समझा सकती है अनुभव करा सकती है।
प्रेम को जीवंत रखती प्रेम सहेली
प्रेम की रुचि और प्रेम की वृद्धि की सेवाओं में किलोलित रहना सखी का जीवन है और यह प्रेम सहेली इसी से जीवंत रहती है |
श्री वृंदावन
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