भक्ति की मधुरता

भक्ति की मधुरता

भक्त को चिंता नहीं की 
मैं पुकारू तो वे सुनेंगे की नहीं
  
अपने मन की मैं जानू 
पी के मन की राम
साँसों की माला से सिमरूँ मैं पी का नाम

न ही चिंता उसे पहुँचने की .

   क्योंकि भक्ति कभी माँगती नहीं 
क्योंकि उसे तो सिर्फ़ अपने इष्ट अपने आराध्य अपने प्रियतम का ही सुख चाहिए ..

काश कभी मोहब्बत मे वो मुक़ाम आए 
की चोट तुझे लगे और ज़ख्म मेरे नाम आए

यही तो भक्ति की मधुरता है मिठास है 
की स्वयं का कोई सुख शेष नहीं 
नाम रस मे इतना भीग भीग कर मधुरता का आस्वादन कर रहा की उसे संसार के सुख सुविधा भी दुविधा ही लगते है 

सुख के माथे सिल पड़े जो नाम को भुलाए 
बलिहारी उस दुःख की जो गोविंद नाम रटाए

रसना फुटौ जो अन्य रटौ
निरख अन्य फुटौ नैन 
श्रवण फुटौ जो अन्य सुनौ 
बिन राधा जस बैन...

यही तो भक्ति (प्रेम) का व्रत है 

सुविधा मिले न मिले पर हृदय में मधुरता ज़रूर भर देती है श्री भक्ति श्री प्रीती 

श्री वृंदावन

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