प्रेम का मान
प्रेम का मान एक नवीन आनंद
तुझसे उठी तेरे दिल की चाहत को मैं जीता हूँ
फिर भी प्यारी तुम किस कारण मान करती हो ..
एक ही तन मन रंग में रंगे एक ही विलास के रसिक हम दोनो
फिर भी प्यारी अन्य हठ क्यों करती हो ..
न मेरा हित न प्यारी जू तुम्हारा
हम दोनो के एक मनोरथ
फिर किस कारण से रूठ में ना ना कहती हो ..
हरिदासी सखी श्री प्रिया प्रीतम की इस मधुर प्रीति का अवलोकन करती हुई हितैषी सखियों से कहती हैं :-
प्रेम में प्रेम का ही हित है
अन्य कोई हित प्रेम में या प्रेम का है ही नहीं ..
प्रेम से अलग चाह या अन्य हित उठने पर ही प्रेम में मान ,प्रेम के पोषण हेतु ही मान स्वतः प्रकट हो जाया करता है
अन्य चाहत ही प्रेम का शोषण है
मान से प्रेम अपने प्रेम को सुरक्षित कर उसकी तुष्टि पुष्टि और वृद्धि करता है..
आह सखी यह प्रेम पावस की रिम झिम कितनी सुहावनी है
इनकी फुहारों में भीगने का आनंद
भी है और थमी रुकी वर्षा पर और और भीगने का इंतेजार परस्पर प्रेम करता मनुहार भी है ..
यही तो प्रेम का नवीन आनंद है सखी
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