रस रमण

रस रमण

रस का अपनी स्निग्धता में ही रमण है

  यह स्निग्धता है 
रस की मधुरता उसकी आद्रता उस रस का सरस ,मधुर ,नवनीत ,गलित ललित 
स्वभाव इसी से रस रस है।
यह स्निग्धता ही रसानूभूति कराती हैं 
रस की मधुरता का अनुभव ।
    
प्रेम में ही हृदय श्री कृष्णक्रीड़ाके उपयुक्त स्निग्ध होता हैं ।उनके पादपद्मयुगल के स्पर्श से प्रेमी के हृदय को विरह प्राप्त होता हैं और इस विरह में प्रेमी का हृदय तत्क्षणात  स्निग्ध हो जाता हैं ।
यह स्निगधता (आद्रता ) यह भीगा भीगा पन जितना जितना आद्र होगा हृदय उतना स्निग्ध होकर उतना उतना सरस होता हैं । और सरस हृदय में विशुद्ध प्रेम का आर्विभाव है।

   इस आद्रता को चित्त की कर्कश्ता से हानि है अर्थात जीव स्वरूप की कपटता (आत्मवंचना)
      त्रिभुवन को स्निग्धता सम्पादित करने वाले श्री हरि की मुरली निनाद में आद्रता का स्पर्श हैं और विरह से संतप्त हृदय को आद्रता का स्पर्श है
  वे ही त्रिभुवन को आद्र करते हैं ।
    और आद्रता यह स्निग्धता की पराकाष्ठा श्री प्यारी श्री रसीली श्री राधे है।इसीलिए उनके प्रेम में सूक्षतम उपाधियाँ भी नहीं मात्र श्री प्रियतम सुख लालसा ,
  और यह ही सच्चा सुख निरूपाधि ,प्रेम  की सर्वोतकृष्ट सर्वोच्च सर्वाधिक ही यह स्निगधता है ।
श्री जू इसी स्निग्धता की पराकाष्ठा हैं।
  श्री श्याम सुंदर अपनी हीं पराकाष्ठा में रमण करते हैं 
जिधर जिधर स्निग्धता का दर्शन हैं ,मात्र उधर प्यारी का भाव हैं 
अतः  यह ही दर्शन होता की रस का रमण स्वयं की स्निग्धता में ही है रस का रमण अपनी मधुरता में हीं है
अन्य कही न अतः एक ही रस स्वभाव वत विलास हेतु 
रमण रमणी और अनंत केलियाँ हो जाता हैं 
यह रस विलास 
रस से विलग न 
   और माधुरी रस से अलग न ,एक ही तत्व के पर्याय हैं 
स्निग्ध प्रेम की पराकाष्ठ दशा में प्रेम की सभी उपाधियाँ गलित हो जाती हैं कौन कांत और कौन कांता, तभी तो श्यामा श्याम और श्याम श्यामा हो जाते हैं 
यह ही प्रेम फल हैं

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