भुला सा गोपाल
स्वयं को भुलाकर ही प्रेम में भूला जा सकता
तभी मेरा मोहन भूला भूला सा रहता ..
भूला सा भोला होकर जो करता नटनागर
वे लीलाएँ हो जाती
वही कथायें
मधुर पीयूष रस बरसाती ..
मेरो भूला भूला सा भोला गोपाल
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मेरो भूला भूला सा भोला गोपाल
मेरो मीठा मीठा सा मधुर नंदलाल
चंचल चंचल सा चपल घनश्याम ..
ब्रज जनों का राजकुमार
प्रेमी जनों के हृदय विराम
करो मेरे मन का हरण मेरे जीवन के पूर्णविश्राम ..
मेरो भोला भोला सा भूला गोपाल .......
सस्वर वेणु गाता बजाता..
ब्रज युवतियों का जी चुराता ..
अपने कर पल्लव थिरकाता ..
चंचल नयन नचाता ..
अपनी रोम रोम राशि से प्यारी ललि को पुलकाता ..
वही मेरे उरआँगनमें अपनी प्रेमलगन बरसाता ..
मेरो भूला भूला सा गोपाल ......
रसिक भक्त करते तेरे जिस चरितामृत का पान ..
झूम झूम मस्ती मे गाते जिन रस केलियों का गान ..
धन्य धन्य हो जाऊँ मैं भी जब मिले मुझे भी उस मदिरा का दान ..
मेरो भूला भूला सा भोला गोपाल ........
हे मृदुल मनोहर सुधा रस रासि..
हो जाऊँ मैं भी तुम्हारे रूप रस सौरभ केलि कलाओं के श्रवण की अभ्यासी ..
कल कालिन्दी कूल मध्य मेरे कुंजबिहारी ..
तुम्हारी स्फूर्णा के स्फूरित विलासों की अब मुझे भी बना लो सदा सदा का अधिकारी ...
मेरो भूला भूला सा भोला गोपाल .......
श्री वृंदावन
🌷🙏🌷
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