प्रेम फल

* प्रेम फल*
प्रेम की पराकाष्ठ दशा में गलित हुआ बोध ...
रस घनीभूत हुआ बहा आद्रता में 
प्रमोद ...
अनेक उपाधियाँ भी विलुंठित हुई 
शेष रहा 
आनंद दशा विनोद ...
विनोदिनी श्याम वर्ण हुई उज्ज्वल हुआ रस मनोज ....
प्रेम की इतनी स्निग्ध सींच कीच में बहुरंग हुआ मदन रज सरोज ....
स्निग्धता और और आर्विभाव हुई 
सघनतम हुआ संग ..
अतृप्ति से रस तनमयता बढ़ी ,
और 
रस की तनमयता में भेद हुआ भंग ...

सखी !!
रस मधुराई की पराकाष्ठा मे
न कांत न कांता 
न नील न पीत 
शेष रहे  तदाकार विलसते विलसित शृंगारों के रंग ..

*हे प्रेम सहेली यही तो फल है प्रेम का* 
*विलासों की तनमयता में ललित* *ललित प्रेम में लालित पालित सघन*
  *से सघन संग*

।। धन्य धन्य तु प्रेम पुष्प मालिनी श्री ललिते 
जो निरंतर सदा इस प्रेम फ़ूल के लालन पालन में प्रेम फ़ूल की लता पता शाखाओं को आद्र रखती ।।

श्री ललिते 
श्री वृंदावन 🌺☘️🌺☘️🌺
🙏🙏🙏

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