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Showing posts from March, 2022

प्रेम मुदिता

*प्रेम मुदिता*              उन्मत्त प्रेम मदिरा -----------------------------------------------    थमी रहना चाहती थी एक ही राग में एक ही रस एकत्व मे प्रेम संगिनी  प्रेम मुदिता ~    पर देखो न यह रसों का हुलसन विलसन कभी थमने देता है क्या ..   ले आया प्रेम रवनी को और करीब और समक्ष  ,अनेक श्रृंगारों के अनेक राग अनुरागों के रंजन में ..    वह तो अभी विभास के गोद में पल्लवित ही  हो रही थी ,और बस सिमट जाना चाहती थी अपने सिमरन में खिल जाना चाहती थी,पर  उस सिमिर  ..उस तिमिर ..का रस अतिरेक बहाता गया रस वर्णी  को अनेक  रसों के सुरंगों में अनेक रागों के रंगो में...    प्रेम मञ्जरी भी न थम सकी, न थाम पाने में ही कुशल हो पाई ..उरझ गई ,फँस गई, इन राग रसों के मदन बहकावे में  , प्रेम राग के तानों बानों की  ध्वनि में अंग अंग से विह्वल हुई अपने आंतरिक प्रीति को संगोपन करने में असावधान हुई और .. और.. कब एक एक राग के अनुराग स्नेह से प्रेम पल्लवी पालित पोषित हुई  और भी चमत्कृत हुई ...

षोडश भाव माधुरी

*षोडस भाव माधुरी*          *ललित लला रस रचना* कोमल मुग्ध चपल दृष्टि से अनिवर्चनिय चंचलता की सृष्टि करे - निष्कलंक चंद्र तेजपूर्ण वदन मण्डल परमानन्द रूप सर्वताप हरे- आलौकिक रूप सौरभादि गुण शिखिपुच्छ चूंड धरे- रभस संभाषण ,हर्षित आद्र सरस प्रेमाधीर भरे- वेणु वादन रत ,बिम्बतुल्य अधर, महाप्रेम विलास रचे- संकेत रूपी वेणु स्वरसम्पदा चित्त हरण कर द्रवित करे - निरक्षर कथनों से अधीर विम्बधरों से केलि उत्सुकता का संकेत करे- वेणु वादन रत, मुरलीरवामृत क्लीं क्लीं केलिनाद करे- कृपाम्बुधि ,प्रेमरस रंगी ,श्री श्रृंगारिणी का श्रृंगार बने- लोचन वचन ,भुवन मोहन, त्रिभंग रस लहरी ,कुलवती मन लोभित करे - मधुरातिमधुर ,स्मरमदन मद, उत्फुल्ल हृदय दुर्ग में अधिकार कर बिहार करे- नृत्यछन्दमय गति, मधुर हास्य छबि, अद्भत माधुरी, नयनउत्सवे- सर्वाकर्षक सर्वाह्लादक माहरसायन रस समूह के आगार श्री प्रिया के नयनो में आह्लाद करे - श्री महाभाविनि के महासिंधु रस में   तरंगित हुए , हृदय में अफुरन्त केलि कामनाओ की लहर उठे - नीलउत्तपल दल सुकोमल मदन कुसुम सर भजो प्रेमरसरचना मनोहरे- *श्री वृन्दावन* ...

केदार में बसंत का प्रवेश

*केदार में बसंत का प्रवेश*    उत्सव में दो उत्सों का मज्जन.. एक चाह में दो रागों का चित्तरञ्जन.. ---------------------------------------------- यह कैसी  रस के डोल में रंगों की होड़ री सजनी  कभी  अंग अंग के संस्पर्श से  रंगों के संसर्ग से  परस्पर श्रृंगारों के खनक झनक से   सज उठा डोल ......... होरी की धमार पर  केलि के किलोल पर  छिड़ गया  अनुरागों का होड़ ....... देखो री देखो सखी .. आया बसंत प्रेम रंगों का डोल .......