प्रेम मुदिता
*प्रेम मुदिता* उन्मत्त प्रेम मदिरा ----------------------------------------------- थमी रहना चाहती थी एक ही राग में एक ही रस एकत्व मे प्रेम संगिनी प्रेम मुदिता ~ पर देखो न यह रसों का हुलसन विलसन कभी थमने देता है क्या .. ले आया प्रेम रवनी को और करीब और समक्ष ,अनेक श्रृंगारों के अनेक राग अनुरागों के रंजन में .. वह तो अभी विभास के गोद में पल्लवित ही हो रही थी ,और बस सिमट जाना चाहती थी अपने सिमरन में खिल जाना चाहती थी,पर उस सिमिर ..उस तिमिर ..का रस अतिरेक बहाता गया रस वर्णी को अनेक रसों के सुरंगों में अनेक रागों के रंगो में... प्रेम मञ्जरी भी न थम सकी, न थाम पाने में ही कुशल हो पाई ..उरझ गई ,फँस गई, इन राग रसों के मदन बहकावे में , प्रेम राग के तानों बानों की ध्वनि में अंग अंग से विह्वल हुई अपने आंतरिक प्रीति को संगोपन करने में असावधान हुई और .. और.. कब एक एक राग के अनुराग स्नेह से प्रेम पल्लवी पालित पोषित हुई और भी चमत्कृत हुई ...