केदार में बसंत का प्रवेश

*केदार में बसंत का प्रवेश*

   उत्सव में दो उत्सों का मज्जन..

एक चाह में दो रागों का चित्तरञ्जन..
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यह कैसी  रस के डोल में रंगों की होड़ री सजनी 
कभी 
अंग अंग के संस्पर्श से 
रंगों के संसर्ग से 
परस्पर श्रृंगारों के खनक झनक से  
सज उठा डोल .........

होरी की धमार पर 
केलि के किलोल पर 
छिड़ गया 
अनुरागों का होड़ .......

देखो री देखो सखी ..
आया बसंत प्रेम रंगों का डोल .......

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