प्रेम मुदिता

*प्रेम मुदिता*
 
           उन्मत्त प्रेम मदिरा
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   थमी रहना चाहती थी एक ही राग में एक ही रस एकत्व मे प्रेम संगिनी  प्रेम मुदिता ~
   पर देखो न यह रसों का हुलसन विलसन कभी थमने देता है क्या ..
  ले आया प्रेम रवनी को और करीब और समक्ष  ,अनेक श्रृंगारों के अनेक राग अनुरागों के रंजन में ..
   वह तो अभी विभास के गोद में पल्लवित ही  हो रही थी ,और बस सिमट जाना चाहती थी अपने सिमरन में खिल जाना चाहती थी,पर 
उस सिमिर  ..उस तिमिर ..का रस अतिरेक बहाता गया रस वर्णी  को अनेक  रसों के सुरंगों में अनेक रागों के रंगो में...
   प्रेम मञ्जरी भी न थम सकी, न थाम पाने में ही कुशल हो पाई ..उरझ गई ,फँस गई, इन राग रसों के मदन बहकावे में  , प्रेम राग के तानों बानों की  ध्वनि में अंग अंग से विह्वल हुई अपने आंतरिक प्रीति को संगोपन करने में असावधान हुई और ..
और.. कब एक एक राग के अनुराग स्नेह से प्रेम पल्लवी पालित पोषित हुई  और भी चमत्कृत हुई ,कब वह भी उन रागों की समाराधन में सुहागन होने लगी  श्री सौरत रस रँगी को पता ही न चला ...पता ही न चला ...
  बस वो पल सिर्फ पल रह गया  सारे होश  मिट गए ,दर्शन- दृश्य- दशा- देश
प्रेम तल्लीनता ही मात्र स्थिर रही 
प्रकट अप्रकट  अन्य बोध भी गलित ... शेष थी उसकी बस उसकी मुदिता ...प्रेम मुदिता

सुन री ..
'प्रीत की प्यारी सखी'

     कहती प्रेम मुदिता ..

     " आह री सखी ' रस के वश में हुई मैं रस वरणा ..
प्रेम की प्रणवाली ..प्रेम में पड़ी हुई..
प्रेम लताओं में विस्तृत हुई ..विलास रस  की गृहणी .. उसके  चपल सलोल राग विनोद के नवीन नवीन रसउत्सर्जनों को स्वीकारती रही एक रोमांचित अनिवर्चिनिय रसोत्सव प्रेममहामोद महोत्सव में ..
       प्रेम के ये प्रवाहित आन्दोलित रति रस परमानंद के मूल, मुझे मेरे रोमांच से एक कर देते है।
और भी ललित...महाप्रेमाविष्ट...

कहती लाड़ बावरी उन्मत्त प्रेम की मदिरा प्रेम मुदिता ...

   *श्री वृन्दावन*

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