षोडश भाव माधुरी
*षोडस भाव माधुरी*
*ललित लला रस रचना*
कोमल मुग्ध चपल दृष्टि से अनिवर्चनिय चंचलता की सृष्टि करे -
निष्कलंक चंद्र तेजपूर्ण वदन मण्डल परमानन्द रूप सर्वताप हरे-
आलौकिक रूप सौरभादि गुण शिखिपुच्छ चूंड धरे-
रभस संभाषण ,हर्षित आद्र सरस प्रेमाधीर भरे-
वेणु वादन रत ,बिम्बतुल्य अधर, महाप्रेम विलास रचे-
संकेत रूपी वेणु स्वरसम्पदा चित्त हरण कर द्रवित करे -
निरक्षर कथनों से अधीर विम्बधरों से केलि उत्सुकता का संकेत करे-
वेणु वादन रत, मुरलीरवामृत क्लीं क्लीं केलिनाद करे-
कृपाम्बुधि ,प्रेमरस रंगी ,श्री श्रृंगारिणी का श्रृंगार बने-
लोचन वचन ,भुवन मोहन, त्रिभंग रस लहरी ,कुलवती मन लोभित करे -
मधुरातिमधुर ,स्मरमदन मद, उत्फुल्ल हृदय दुर्ग में अधिकार कर बिहार करे-
नृत्यछन्दमय गति, मधुर हास्य छबि, अद्भत माधुरी, नयनउत्सवे-
सर्वाकर्षक सर्वाह्लादक माहरसायन रस समूह के आगार श्री प्रिया के नयनो में आह्लाद करे -
श्री महाभाविनि के महासिंधु रस में तरंगित हुए , हृदय में अफुरन्त केलि कामनाओ की लहर उठे -
नीलउत्तपल दल सुकोमल मदन कुसुम सर भजो प्रेमरसरचना मनोहरे-
*श्री वृन्दावन*
(नवनील की नविता)
(रस की रसना)
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