सौंदर्य और बोध

*सौंदर्य और बोध*

प्रेम वान चित्त सदैव सरस् होता है ,उसके हृदय में कभी घृणा उत्तपन्न होती ही नहीं ।प्रेमी को ही सम्पूर्ण विष्व सौंदर्यमय दिखता है ,क्योकि श्री भगवान ही सम्पूर्ण सौंदर्य के अधिष्ठान है और सम्पूर्ण विश्व उनके सौंदर्य किरणों से आलोकित है ।अतएव सर्वत्र सौंदर्य के दर्शन में सहज ही प्रेमी का चित्त रस विभोर रहता है ।नीरस चित्त में इसका स्पंदन उठता ही नही कारण उसका अंतःकरण ।
प्रेम का स्वाद सौंदर्य है ,दोनो ही एक दूसरे के प्रति आकृष्ट है ,और इनकी एकमय  स्तिथि श्री प्रेम धाम श्री वृन्दावन के नव निकुंजो में है ,जिधर दोनो एकरस हो जाते है ।

श्री वृन्दावन 
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