सहज चिंतन

*सहज चिंतन*
   

दुख और क्लेश में क्या फर्क है 
      फर्क बहुत गहरा भी और ज़रा सा भी ,दुख में चिन्तन बनता है प्रभु का पर क्लेश में प्रभु चिन्तन असम्भव है ,
कारण क्लेश मोह द्वारा उत्पन्न होने मन को दूषित और व्यथित कर देता है ,क्लेश स्वयं के जगत के माने हुए असत  सम्बन्ध से आता है अतः क्लेश मन की उपज है मन से ही मोह है ,और मोह में असत्य का ही ध्यान और चिंतन बना रहता है ,क्लेश प्रारब्ध द्वारा नही अपितु वर्तमान की उपेक्षित इक्षाओ और  कर्मो का परिणाम है ,सो जीवन 
में क्लेश आता है तब सहज  आत्मिक प्रसन्नता और विशुद्ध चिन्तन छूटने लगते है ।
यह क्लेश है  प्रपंची है जो राक्षसी सम्पत्ति है 
आसुरी प्रभाव है मनुष्यता पर ।
पर दुख तो प्रारब्ध के भोग है जिन्हें सहज भोगने पर वह कर्म क्षीण हो जाता है और चेतना नवीन हो कर अग्रसर करती है ,मुख्य बात दुख के काल मे पीड़ाओं से भरा हृदय द्रवित होकर प्रभु की शरण हो गलित होकर पुकारता है ।
दुख की पुकार तीव्र होती है प्रभु को स्पर्श करती और उनका हमे भी स्पर्श कराती है अनुभव कराती है की वे श्यामा श्याम, वे नाथ ,वे मेरे ठाकुर ,मेरे गोविन्द मेरे ही हर पल साथ है ,
यह पुकार मार्मिक भजन है जो दुख की कॄपा से सहज मिलता रहता है पर कोई दुख की महिमा और कदर जाने तो ,
पर स्वसुख में आसक्ति होने के कारण 
दुख कोई नही चाहता 
कमज़ोर हृदय डरता है पर निर्बल हृदय ही दुख का स्वागत करता है 
क्योकि निर्बल के बल राम 
जिसके जीवन मे राम है उसे तो दुख में भी आराम है 
इसी कारण पांडवों की माता कुन्ता जी ने श्रीकृष्ण से वरदान में दुख ही मांगा 
क्योकि प्रियजनों 
दुख ही जीवन की वह कसौटी है जिधर आपकी चेतना निखर कर आती है 
इतने इतने इतिहास में महापुरुषों का जीवन इतिहास पढ़ लो दुख के इलावा मात्र ही कही कदार सुख सुविधा का दर्षन होगा 

सुख सुविधा मिले तो बांटे और उपयोग में लाये फिर ,क्लेश से बचेंगे 
दुख आये तो स्वागत कर नवीन उत्सर्जन होने जा रहा यह अनुभव में अपने आत्मिक प्रभु में गोता लगाए 

सहज सब शुभ ही शुभ फिर 

श्री राधा 🙏🌷🙏

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