श्री प्रेम जू

*श्री प्रेम जू*

स्वसुख को अग्नि में जलाकर ही प्रेम का  आलोक प्रकाशित होता है ।
पर जब बढ़ता है तो धैर्य और मर्यादाओं के बांध को तोड़ते हुये आगे बढ़ता है ।
पर निर्ब्याज अनासक्ति और विवेक के मार्ग के बीच से ही गुजरता है ।
ऐसी निर्मल निर्झर धारा ही प्रेम सागर में जा मिलती है और श्री कालिन्दी होकर प्रेम की अविरल सेवा में तन्मयता को प्राप्त कर लेती है ।

श्री वृन्दावन 
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