चिंता शोक और भय

चिंता शोक और भय 
यह कर्म फल है आये है चले जायेंगे 
इसीलिये इनको स्थान न दे 
ठीक उसी प्रकार सुख सुविधा लाभ 
यह भी कर्म परिणाम है जो स्थिर नही रहेंगे 
यह भी जाने वाले है 
इनका भी जीवन मे आदर न हो 
यह सभी वृत्तियां है जो भजन रस को बिखेर देती है इनके चिंतन बनने पर ,
इनके स्पर्श से भी किया गया भजन नष्ट हो जाता है और स्मृति का नाश होता है ।
यह वृत्तियां तब तक परेशान करती जब तक स्वयं संसार से मोह है ,
अतः मोह के नष्ट होने पर ही ,प्रेम भक्ति एक धारा में बहती है तब वही प्रेम रस में रूपान्तररित हो जाता है ।

तभी गीता जी मे कहा है कि 
नष्टो मोहा स्मृतिलब्धवा 
अतार्थ 
मोह के नष्ट होने पर 
स्वयं की स्मृति सहज सुलभ है 

जो पढ़ने सुनने की वस्तु  नही अपितु 
स्वयं की अनुभूति पर है ।


श्री राधा 🙏🌷🙏

Comments

Popular posts from this blog

प्रेम बोध

पक्षी तू कब उड़ेगा

रोग कृपा