मधुर होने की लालसा
*मधुर होने की लालसा*
भीतर मधुरता ही मधुरता भरी हो तो श्री माधव मधुरता चखने क्यो न आवेंगे ...
मधु का पान भ्रमरी श्री माधव जू की भोग्य वस्तु है ।
अस्तु
मधुर माधव की मधुता वही प्रकट है
जिधर हृदय ही मधु हो जावे ..
अतः
जीवन मे मधुरता को प्रयास कर सावधानी पूर्वक भरे चंचलता ही पात्रका छेद है ।
कैसी चंचलता
जड़ता की चंचलता
जड़ मन की अवस्था
स्थिर ,एकाग्र हो कर रुचिपूर्वक मधुता को ग्रहण नहीं कर पाती ।
विचारों की चंचलता ही मन की जड़ता है ।
एक भी ललित नाम को मधु वत पिया जाए नित्य नित्य तो सहज ही मधुरता भरेगी ।
यह ही कारण से
स्त्रोत नामावली हृदय को मधुरता से भरने की दिव्यतम औषधि श्री आचार्य जू द्वारा
पर बुद्धि की चंचलता इन्हें
बिन रुचि से
पाठ या नियम समंझ कर
करती है तब उन्हें सुख न हमे उमंग बने ।
अगर ये नामावली हमारी प्राण बन जाये और सेवा रुचि वश एक एक नाम का स्वाद भरे
तो वही रस गुण भरेगा जो उन नाम जू में ओतप्रोत है ।
जब स्वयं को कोई पुलकित तरंग अनुभव नही होगी तो कैसे सोच सकते है कि उन्हें सुख बना
अतः
उतस्वित स्थिर होकर रुचिपूर्वक श्री
नामावली जू के नाम गायन से भीतर ही भीतर मधुर स्राव बनने लगता है
ललित झरना शुरू होने लगती है ।
भीतर मधुरित माधव अपनी ही माधवी से खेलने लगते है
उनका उत्सव हमे सहज ही झुमाये रखेगा
प्रयास हो जीवन को मधुर रखने का
यह ही सावधानी रखने की ।
निश्चित नाम जू जिस विधि से भी ले
हृदय परिवर्तन होता ही होता ,पर इस तरह नाम जू का स्वाद ले ले भरे तो उनकी नवीनता वे खुद प्रकट करेंगे ।
श्री राधा
🪷🙇♂️🪷
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