संचय बिंदु
*संचय बिंदु*
भक्त के अश्रु श्री हरि की अराधना के
प्रेम जल अर्घ्य बिन्दु है ,अतएव उन्हें श्री हरि के प्रसन्नतार्थ संचय कर रखना चाहिए उसे संसार के वियोग ,दुःख,दर्द कष्टो आदि में न खर्च करना चाहिए कारण वही बिन्दु अर्घ्य ,प्रेम सिंधु में मिलकर दिव्य प्रसन्नता का हेतु बन जाता है ।
संसार के हर्ष और दुख इसी कारण दोनो ही त्याज्य है , इनका आस्वादन ही अनर्थकारी है ,इसी का त्यागी ही वास्तविक त्यागी है रसोप्सना का पात्री है ।
जैसे मिट्टी के करुए में एक बार तेल भर लाये फिर उसे कितना भी माजा धोया जाए ,तेल की गंध और उसकी लहर पानी की सतह पर झिलमिला ही आती है ,ठीक इसी तरह से भक्ति रस मार्ग में सिवाए अपने एक स्वामी जू और बिहारी जू की ही निहारन बने ,
अतार्थ उनकी कृपा का निहारन बने
तो सबरे सुख दुख की सत्ता स्वतः मिटती जाती है ,उच्च कोटि की भक्ति
दोष अवगुण ठहरने नही देती ,पर जब तक ऐसी भक्ति प्रविष्ट नही हुई तब तक तो साधक को दोषों से सावधान रहने की सतर्कता बरतनी चाहिए ,
यह सभी सावधानियां श्री गीता जी सिद्ध भक्त के दिव्य लक्षण के बारे में वर्णित है ।
प्रयास ही तो हमारे अधिकार में है
और कॄपा उनका क्षेत्र
निर्विकारी होने का ही प्रयास है ।
वे कॄपा सिंधु बस यह ही प्रयास पर और अपनेपन पर रीझ जाते है
श्री वृन्दावन
🙏🌷🙏
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