विवेक के फूल
* *विवेक के फूल*
निर्ब्याज अनासक्ति की गोद मे पलने खेलने वाला वैराग्य ही श्री हरि की प्रसन्नता का कारण हो सकता है ,
अगर वैराग्य ऊपर से ओढ़ा हुआ है और भीतर से आसक्ति रूपी डांकिनी बैठी हुई है ,तो वह व्यक्ति को हर समय गंदगी में ही मुँह डालने को विवश करती रहती हैं ,और ऐसी हालत में भी वो साधक कई कई जन्मों के बीत जाने पर भी श्रीहरि की तरफ पीठ किये बैठे रहता है ,
साधक जब अपने को सर्वोपरि मानने लगता है और श्री गुरु का भी महत्व चला जाता है उसके मस्तिष्क से अहंकार के कारण और श्री गुरु चरणों का आश्रित वह नही मानता है अपने को तो उसे संसार की गहरी खाई में जाना ही पड़ता है ।
जो साधक भक्त गुरु चरण आश्रय को ही मुख्य मानता है ,उसे गुरु भक्ति बचा लेती है ।
हम यह मान ले कि हम श्री स्वामी जी के जन है तो हमारे इस मानने से ही संसार मे धसने से बच जाएंगे और
यह ठान ले कि अपने प्रिया प्रीतम को प्रेम रस पान करना ही हमारा अनन्य धर्म है ,तो गिरने से हम बच जाएंगे ,अर्थात ऐसे कर्म करने है जिससे हमारे प्रभु प्रसन्न
हो । दौलत से खेलना ,परिवार सँग हँसना बोलना सब मेले के समागम समान है जो आज है कल नही रहेगा।
जब अन्तरनिर्क्षिप्त विवेक के बीच से जो वैराग्य का अंकुर फूटेगा और पल्लवित होगा उसी पर प्रेम के मकरन्द से भरे भक्ति के फूल खिलेंगे
और ऐसे फूल खिलेंगे ,जो श्री बिहारी जू को सर्वाधिक प्रिय है ,और तब श्री स्वामी श्री हरिदास जू उस साधक का हाथ पकड़कर उसे श्री श्यामा कुंज बिहारी के रँगमहल की केलि निकुंजो में पहुंचा देंगे ।
यह श्री गुरु महिमा है जो साधक की प्रीति चरण आश्रय देखकर उसपर कॄपा करते है ।
श्री हरिदास
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