रसरत्नावली
रस राग रंग और रत्न इनका घनीभूत ललित माधुर्य सँग रसायन है
श्री कॄपा से जो दशा निरंन्तर इस अमृत पान में स्वयं को निमज्जित रखती है ,
वह शीघ्र ही अपनी तात्विक अनुभूति में प्रविष्ट होती है ।
जिधर से फूटी थी जिधर से निरझरा होकर बही थी ,उधर की ओर की गतिमय होने लगती है ।
यह श्री ललित करुणा ही है कि ललित ललायित भावनाएं रुकती नही ठहरती नही ,सदैब गतिमय रहती है अनन्त माधुर्य की ओर ।
जय जय श्री रस रत्नावली
श्री वृन्दावन
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