कृपानुभूति और दशा

*कृपानुभूति और दशा*

निरंतर प्रभु के चिंतन सागर में डूबा हुआ महा हटी मन, तब गल कर प्रभु के प्रेम को प्राप्त करता है ।
जब मन की कठोरता गल गल कर  पानी पानी हो जाये तब मन को गुरु की कृपा के चिंतन में रखना चाहिए ।
 तीन बात जिसके जीवन मे प्रकट हो जाये उस पर इष्ट कॄपा प्रकट होने में  देर नहीं लगती, तब अकारण करुणा वरुणा बरस पड़ती है ऐसे शिष्यो पर ,
वह तीन  बात है ,
प्रथम -
प्रेमी सद्गुरु की प्राप्ति
दूसरी - उनके प्रति हमारी श्र्द्धा 
तीसरी - वे हमें अपना ले 
   जब वे हमें अपना लिये तो फिर सहज लाडली लाल हमे भी अपनाने में पल भर देरी न करेंगे ।
उनके है पर उनका होकर जीवन को उतस्वित हो कर नही जी पा रहे ,
   हृदय में आनन्द का अनुभव न होना या विरह दशा ही होगी या तो गुरु ईश सँग से छूटी हुई दशा होगी।
     बस दशा ही का परिवर्तन करना है 
वरना वे तो स्वयं हृदय के सरकार  है 
पर न जाने कितनो कितनो को हृदय का  स्वामी बनाये हम बोझ लिए ढ़ो रहे ,तभी तो उनका स्वभाव प्रकट ही नही हो पाता ।
भय शंका कठोरता निराशा इत्यादि संक्रमक विपरीत स्वभाब से आक्रांत
हमारी भीतर की दशा बनी हुई भजन करते सब साधन करते भी ,
कारण  वही तीन बात ,
गुरु मिल  गए पर श्र्द्धा वैसी नही बनी जैसे होनी थी 
उन्होंने तो अपना ही लिया ,
पर  उनसे अपनेपन के भाव  की कमी रह गयी हमसे ।

जो जितना जितना भीतरी कॄपा में डूबा  हुआ है 
वह उतने उतने सहज स्वभाव में स्तिथ उनकी कृपानुभूति में प्रफुल्लित है ।

श्री वृन्दावन 🙏🙇‍♂️🌷

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