अमृत वाणी श्रीभगवत रसिक जु

अमृत वाणी श्री भगवत रसिक
               जू की 

अगर साधना में आगे बढ़ना चाहते हो तो संसार मे किसी से नफरत नही करना 
किसी का दिल नही दुखाना चाहिए
अगर किसी के दर्द को सहलाने का मौका मिले तो हात भी नही खीचना 
चाहिए।
अपने साथ साथ सबके भीतर भी उन्ही एक परमात्मा का दर्शन करना चाहिए 
हम उसके है ,सब उसके है और वो सभी के हितैषी है 
वो हममें भी और सर्वत्र वयाप्त भी 
इस एकात्म भावना रखकर जो आराधना करता है ,उसी के मठ मन्दिर में उसके हृदय श्री प्रभु विराजते है ।
हिंसा नफरत द्वेष दोष कपट यह वह खाई है जो भक्ति को खिलने नही देती 

भक्त भागवत दास जी के अमृत वाणी 
जो आगे चलकर  
रसिक शिरोमणि 
श्री भगवत रसिक जू कहलाये 

यह नाम आप श्री के दादा गुरु द्वारा प्राप्त हुआ था 
 श्री भगवत रसिक अपनी जन्मस्थली  जू गढा कोटा (जबलपुर) मध्प्रदेश से पैदल श्री वृन्दावन आये थे ।

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