प्रेम द्वेष
*प्रेम द्वेष*
स्मृति और कल्पना के मध्य में जब हमारी दशा रहने लगती है ..
तब चाह और अफसोस
चिंता और भय
दुख और नफरत में तीसरा विकार प्रेम में द्वेष ,उत्पन्न हो जाता है, जो प्रेम के स्वरूप को विकृत कर देता है
अर्थात जिस हृदय में द्वेष उत्पन्न होने लगता है, उधर प्रेम नहीं ठहरता I
द्वेष बीती बातों से, चाह( अपने अनुकूल व्यवहार) न पूरा होने से आ जाता है, द्वेष में अफसोस और ईर्ष्या रहने से प्रेम सहज त्याग कर देता है उस हृदय को I
संसार मे जिसके प्रति हमारा द्वेष सिद्ध हुआ है उस उस व्यक्ति वस्तु देश काल परिस्तिथियों का हमसे सहज त्याग ही हुआ है I
क्योंकि दोष देखना ही द्वेष है
जिधर दोष उधर प्रेम अपनी उन्मत्त अवस्था को खो देता है I
प्रेम स्थिर रहते हुए भी उन्मत्त है I
भूत और भविष्य में प्रेम नहीं
प्रेम तो वर्तमान की स्तिथि हैं इस हेत नित्य नवीन है I
कल्पना और स्मृति यह ही भूत और भविष्य है जिनके चिंतन से वर्तमान बिगड़ता है I
नित्य नूतन दिवस है
जो दिन बीत ग़या वो लौटेगा नहीं
बस बीती बातों पर दुख ही द्वेष को प्रकट कर हृदय का रस खट्टा कर देता है I तब प्रेम में एक दुख और भय की रचना होने लगती हैं ,जो ईर्ष्या का वातावरण निर्मित कर देती है I
यह मलिनता प्रेम को नष्ट कर देती है,
प्रेम गली में तो प्रेम ही रहेगा
अन्य विपरीत भाव विरोधी तत्व आते ही प्रेम उस हृदय उस व्यक्ति का त्याग कर देता है I क्योंकि द्वेष की अग्नि हृदय की शीतलता को आहत करती है आहत होने से प्रेम ही द्वेष रूप मे अनुभव होने लगता है I
प्रेम में विपरीत तत्व का प्रवेश, प्रेम के स्वरूप और स्वभाव की हानि कर देता है
जीव प्रेम रूप ही है
प्रीति उसका स्वभाव
पर विकार आ जाने से अपने मूलभूत
स्वरूप में न स्थिर है न उन्मत्त I
श्री वृन्दावन
🙇♂️🌹🙇♂️
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