गुरु कृपा

*गुरु कृपा*

*दुर्गम काज जगत के जेते*
            *सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते*

जब श्री गुरु के करुणा भरी दृष्टि शरणार्थी शिष्य पर पड़ जाती ,
तो उसे स्वानन्द के लिए कुछ करना नही पड़ता ।
गुरुदेव की करुणामयी दृष्टि अपने नयनो से उस आनन्द का बोध कराती है ।
आनन्द का दर्शन करुणा के नयनो से होता है 
अपने  निज आनन्द के  भोग  में कभी स्वामी का आनन्द नहीं बनता । 

एक करुणा ही है जो स्वयं के स्वाद, स्वसुख का लोभ आने नही देती ।

प्रकृति करुणा में ही सब को बांट रही 
और स्वार्थ हृदय निज सुख में संजो रहा ।

भिन्न स्वभाव एकात्म होने नहीं देते 
एकभाव स्तिथ रहने नही देते 

वरना जितनी सहजता प्रकृति में बनी है उतनी ही सहजता भीतर भी रहती

प्रमुख बात की आनन्द का भोग करना आनन्द का स्वयं के लिए  लालसा रखना , हृदय को निर्मल नही रहने देता ।

स्वार्थ की परत चढ़ते ही कठोरता 
की दीवारें बढ़ने लगे जाती है ।
प्रेम का एक ही स्वभाव वह है करुणा 
प्रेम करुणा में पलता है 
करुणा से खिलता है ।
करुणा का दर्शन न कर पाने वाली दशा याचना करती है।
और प्रेमिल हृदय स्वामी की इक्षा पर स्वयं को तत्पर रखता है ।
जितना लिखना सहज है 
पर इस बात पर दृढ़ रहना उतना ही 
असहज हो जाता है ,
यह ही कठिन  प्रयास है  अपनी सहजता में स्तिथ रहना सहजता को संजोय रखना ,

धैर्य और सहनशीलता भी तभी साथ देती जब तक गुरु कृपा सँग है 
मात्र गुरु कृपा से सब सहज है ,

      *दुर्गम काज जगत के जेते*
        *सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते*


जय जय श्री जै जै सरकार जू 
   श्री गुरु चरन सरोज रख 
   निज मन मुकुरु सुधारि..
             🙇‍♂️🙏🙇‍♂️

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