हे हरि
*श्री हरि*
हे हरि ...
हमने न जाने तुम्हें क्या क्या बना डाला
न जाने क्या क्या रच ड़ाला
फिर भी तुममे न भर पाई ..
हे हरि
तुमने भी न जाने मुझे क्या क्या दिखा ड़ाला
न जाने कितना ही उलझा ड़ाला
फिर भी यह भ्रांति स्थिर न रह पाई
कभी तुममे, तुमसे होके, मैं
न जाने कितनी लहरों में बिखराई
पर अपने ही बूंदों को तुममे थमा न पाई...
हे हरि ...
थकी सी जब अनुभवों में भरी
तुमको ही सिर्फ अपने निजता में पाई
फिर भी अपने ही प्राणों में मैं मिल न पाई ..
हे हरि
मै और
तुम की सृष्टि में ,मैं ही खोज पाई
तुम मेरे समक्ष थे पर क्यूँ तुम्हें ने देख पाई...
हे हरि
न हारी ही न सफल ही हूँ
न कुछ बिगड़ी थी न कुछ सुधारी ही हूँ
क्योंकि
संग तो एक तेरा ही है और तेरा ही रहेगा ,फिर भी तेरे ही उमंग में मैं न खिल पाई ...
हे हरि...
जो तेरी रुचि हो
वही इन प्राणों की गति हो
हे नाथ मेरे श्याम
मेरे कृपालु रघुराई ...
श्री राधा
🙇♂️🌹🙇♂️
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