जब प्रार्थना ही प्रेम हो

*जब प्रार्थना ही प्रेम हो*

कारण खोजों भी तो खोज न पाओ 
अकारण  ही तुम्हें प्रेम है 
तो समझना यही प्रेम है ..

   किसी के जीवन से अकारण तुम आनंदित हो 
     किसी के लिए तुम  अकारण आनंदित हो 
तो समझना यह प्रेम है ..

प्रेम एक आलौकिक घटना है 
  यह संसार की बात नहीं 
अंधेरों मे भी रोशनी हो 
तो समझना प्रेम है...

अक्सर लोग कंकड पत्थर ही बीन पाते है 
और हीरे को पाप समझ बैठते है 
क्योंकि उन्हें हीरे की परख नहीं 

संसारी का प्रेम कब घृणा बन जाये 
कुछ कह सकते नहीं 
अक्सर जिसे प्रेम करते थे 
लोग उसी से घृणा भी कर लेते है 
तो समझो यह सिर्फ मोह है 
प्रेम की एक झलक भी नहीं 

माया की चाल ही ऐसी है 
कि घृणा ही प्रेम का रूप धर कर छलती है ...

प्रेम कुछ और नहीं 
 इस पथरीले हृदय में जो थोड़ी बहुत 
आर्द्रता आ जाती है 
उसी का नाम प्रेम है...

प्रेम तुम्हारा स्वतंत्र  स्वभाव है
इसीलिए प्रेम मुक्तिदाई है 
बंधन ही मोह है 
  मुक्तता ही प्रेम है 

प्रेम की ज्योति का तो अनुभव नहीं 
पर दूषित भाव का धूँआ ही धूँआ है 
 तो समझ लेना तुम्हारे प्रेम में
  विजातिय  तत्व बहुत भरा है ...

क्योंकि गिली लकड़ी ही धूँआ करती है 
सूखी तो बिना धुएँ के सुलगती है 

प्रेम में दुख अपनेपन के अभाव से 
ही उपजता है 
भीतर तेरा प्रेम तुझसे कहाँ दूर रहता
 है...
प्रेम को घ्रणा ईर्ष्या और जलन से मुक्त करो 
फिर देखो प्रार्थना की जरूरत
ही नहीं रहीं 
तुम्हारा प्रेम ही प्रार्थना हुआ है 


थोड़ा और लकड़ी को सूखा करो.
देखो फिर कहा धुआँ उठता है 
प्रेम को और निर्मोह करो 
देखो फिर 
कुछ और नहीं, 
प्रेम ही प्रेम कैसा रोशन होता है..

🪷🪷🪷🪷🙏🙏🪷🪷🪷🪷

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