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Showing posts from September, 2021

भुला सा गोपाल

स्वयं को भुलाकर ही प्रेम में भूला जा सकता  तभी मेरा मोहन भूला भूला सा रहता .. भूला सा भोला होकर जो करता नटनागर  वे लीलाएँ हो जाती  वही कथायें  मधुर पीयूष रस बरसाती .. मेरो भूला  भूला सा भोला गोपाल ****************************** मेरो भूला भूला सा भोला गोपाल  मेरो मीठा मीठा सा मधुर नंदलाल चंचल चंचल सा चपल घनश्याम ..     ब्रज जनों का राजकुमार      प्रेमी जनों के हृदय विराम     करो मेरे मन का हरण मेरे जीवन के पूर्णविश्राम .. मेरो भोला भोला सा भूला गोपाल ....... सस्वर वेणु गाता बजाता.. ब्रज युवतियों का जी चुराता .. अपने कर पल्लव थिरकाता .. चंचल नयन नचाता .. अपनी रोम रोम राशि से प्यारी ललि को पुलकाता .. वही मेरे उरआँगनमें अपनी प्रेमलगन बरसाता .. मेरो भूला भूला सा गोपाल ...... रसिक भक्त करते तेरे जिस चरितामृत का पान .. झूम झूम मस्ती मे गाते जिन रस केलियों का गान .. धन्य धन्य हो जाऊँ मैं भी जब मिले मुझे भी उस मदिरा का दान .. मेरो भूला भूला सा भोला गोपाल ........ हे मृदुल मनोहर सुधा रस रासि.. हो जाऊँ मैं भी तुम्हारे रूप रस सौर...

सारँग संदेश

सारंग संदेश शीतल शीतल पवन का झकोर .. सुर सरिता का महानद शोर ...  मोर कोयलों की कूककिलोल ..           संदेश देते कि सौंदर्य अब सजने को हैं । मध्यम मध्यम सा उजला भोर .. सृजन हुआ नव जोवन जोर .. रतिरंग रस की चपल क्रीड़ाओं में  मचल उठे लोभी युगल नयन चकोर .. हाव भाव की विविध भंगिमाओं में  बढ चला नवीन उमंगो का दौर ..      संदेश देते ,ये इशारे शरारती होने को हैं । अलसाई नींदो में रात्रि का चंचल संस्मरण .. पुलकित हो उठा श्रमित शिथिल अंग अंग .. संदेश देते रोमांच अब रिसने को हैं बहार में बिहार विलसने को हैं । रूप सुधा के मद बहाव में .  नव यौवन के रस स्राव में मुदित हो उठा प्रेम अनंग तरंग ..    संदेश देते श्रृंगार अब संग होने को हैं। महाविनोद की अनुरागी दशाओं में  निखरती रही अरुणाई तरुणाई .. विलसे रोम रोम की मदन अंगड़ाई .. संदेश देते पुलकने  और खिलने को हैं।       सुन री सहेली !! कौन है जो खेल गया .. झूमते मधुरासव में बह गया .. संदेश देते  तेरे भीतर की ललिताई अपने सुहाग में और सघन होने को है ।

प्रेम फल

* प्रेम फल* प्रेम की पराकाष्ठ दशा में गलित हुआ बोध ... रस घनीभूत हुआ बहा आद्रता में  प्रमोद ... अनेक उपाधियाँ भी विलुंठित हुई  शेष रहा  आनंद दशा विनोद ... विनोदिनी श्याम वर्ण हुई उज्ज्वल हुआ रस मनोज .... प्रेम की इतनी स्निग्ध सींच कीच में बहुरंग हुआ मदन रज सरोज .... स्निग्धता और और आर्विभाव हुई  सघनतम हुआ संग .. अतृप्ति से रस तनमयता बढ़ी , और  रस की तनमयता में भेद हुआ भंग ... सखी !! रस मधुराई की पराकाष्ठा मे न कांत न कांता  न नील न पीत  शेष रहे  तदाकार विलसते विलसित शृंगारों के रंग .. *हे प्रेम सहेली यही तो फल है प्रेम का*  *विलासों की तनमयता में ललित* *ललित प्रेम में लालित पालित सघन*   *से सघन संग* ।। धन्य धन्य तु प्रेम पुष्प मालिनी श्री ललिते  जो निरंतर सदा इस प्रेम फ़ूल के लालन पालन में प्रेम फ़ूल की लता पता शाखाओं को आद्र रखती ।। श्री ललिते  श्री वृंदावन 🌺☘️🌺☘️🌺 🙏🙏🙏

रस रमण

रस रमण रस का अपनी स्निग्धता में ही रमण है   यह स्निग्धता है  रस की मधुरता उसकी आद्रता उस रस का सरस ,मधुर ,नवनीत ,गलित ललित  स्वभाव इसी से रस रस है। यह स्निग्धता ही रसानूभूति कराती हैं  रस की मधुरता का अनुभव ।      प्रेम में ही हृदय श्री कृष्णक्रीड़ाके उपयुक्त स्निग्ध होता हैं ।उनके पादपद्मयुगल के स्पर्श से प्रेमी के हृदय को विरह प्राप्त होता हैं और इस विरह में प्रेमी का हृदय तत्क्षणात  स्निग्ध हो जाता हैं । यह स्निगधता (आद्रता ) यह भीगा भीगा पन जितना जितना आद्र होगा हृदय उतना स्निग्ध होकर उतना उतना सरस होता हैं । और सरस हृदय में विशुद्ध प्रेम का आर्विभाव है।    इस आद्रता को चित्त की कर्कश्ता से हानि है अर्थात जीव स्वरूप की कपटता (आत्मवंचना)       त्रिभुवन को स्निग्धता सम्पादित करने वाले श्री हरि की मुरली निनाद में आद्रता का स्पर्श हैं और विरह से संतप्त हृदय को आद्रता का स्पर्श है   वे ही त्रिभुवन को आद्र करते हैं ।     और आद्रता यह स्निग्धता की पराकाष्ठा श्री प्यारी श्री रसीली श्री राधे है।इसीलिए उनके प्रेम ...

पक्षी तू कब उड़ेगा

सब कुछ लुटा कर लुट कर हीं उन्हें पाया जा सकता हैं  पर हम न लुटने को तैयार हैं  न लुटाने को  हम तो मुक्ति के रास्ते पर भी समेट समेट कर चल रहे  और बात करते प्रेम और भक्ति की उनकी  सेवा की  पहले अपनी ही सुख सुविधाओं  से मुक्त न है हम  यह पिंजर जीव और इसका शरीर पिंजरा का कितना ख़्याल है    पिंजर पँक्षी तभी उड़ान भरेगा जब उसका पिंजरा खुलेगा  यह शरीर और हम एक नहीं हैं  हम क़ैद इस शरीर रूपी पिंजड़े में  शरीर नाशवान की कितनी देखभाल कितना श्रृंगार .. इस शरीर के सम्बंधी से कितनी आत्मियता  जब तक यह सब प्रपंच में मन फँसा आप कहाँ मुक्त हो  आप व्यवहार निभा रहे अध्यात्म में भी बस .. शरीर को महत्व न दीजिए बस जो सेवा वे लेना चाहेंगे आपके शरीर द्वारा फिर वे वैसी स्थिति भी देंगे  स्वास्थ्य या बिमारी सब कृपा उनकी  उनकी वस्तु हैं  उन्हें इस्तेमाल करने दीजिए