*प्रेम द्वेष* स्मृति और कल्पना के मध्य में जब हमारी दशा रहने लगती है .. तब चाह और अफसोस चिंता और भय दुख और नफरत में तीसरा विकार प्रेम में द्वेष ,उत्पन्न हो जाता है, जो प्रेम के स्वरूप को विकृत कर देता है अर्थात जिस हृदय में द्वेष उत्पन्न होने लगता है, उधर प्रेम नहीं ठहरता I द्वेष बीती बातों से, चाह( अपने अनुकूल व्यवहार) न पूरा होने से आ जाता है, द्वेष में अफसोस और ईर्ष्या रहने से प्रेम सहज त्याग कर देता है उस हृदय को I संसार मे जिसके प्रति हमारा द्वेष सिद्ध हुआ है उस उस व्यक्ति वस्तु देश काल परिस्तिथियों का हमसे सहज त्याग ही हुआ है I क्योंकि दोष देखना ही द्वेष है जिधर दोष उधर प्रेम अपनी उन्मत्त अवस्था को खो देता है I प्रेम स्थिर रहते हुए भी उन्मत्त है I भूत और भविष्य में प्रेम नहीं प्रेम तो वर्तमान की स्तिथि हैं इस हेत नित्य नवीन है I कल्पना और स्मृति यह ही भूत और भविष्य है जिनके चिंतन से वर्तमान बिगड़ता है I नित्य नूतन दिवस है जो दिन बीत ग़या वो लौटेगा नहीं...