Posts

Showing posts from December, 2022

रोग कृपा

रोग एक बहुत बड़ी कृपा हैं    क्योंकि स्वयं के सुख भोगने की इक्षा ही समाप्त हो जाती है    कमजोर इंद्रियाँ ,दुर्बल शरीर में क्षमता ही कहाँ रहती है कि उसका मन उस और भागे  बलिहारी मेरे सरकार की जो इस रीति से मेरे मन पर लगाम है लगायें  जय जय  श्यामा श्याम 🙏🌹

हे हरि

*श्री हरि* हे हरि ... हमने न जाने तुम्हें क्या क्या बना डाला  न जाने क्या क्या रच ड़ाला  फिर भी तुममे न भर पाई .. हे हरि  तुमने भी न जाने मुझे क्या क्या दिखा ड़ाला  न जाने कितना ही उलझा ड़ाला  फिर भी यह भ्रांति स्थिर न रह पाई  कभी तुममे, तुमसे होके, मैं  न जाने कितनी लहरों में बिखराई  पर अपने ही बूंदों को तुममे थमा न पाई... हे हरि ... थकी सी जब अनुभवों में भरी  तुमको ही  सिर्फ  अपने निजता में पाई  फिर भी अपने ही प्राणों में मैं मिल न पाई .. हे हरि  मै और  तुम की सृष्टि में ,मैं ही खोज पाई  तुम मेरे समक्ष थे पर क्यूँ तुम्हें ने देख पाई... हे हरि  न हारी ही न सफल ही हूँ  न कुछ बिगड़ी थी न कुछ सुधारी ही हूँ  क्योंकि  संग तो एक  तेरा ही है और तेरा ही रहेगा ,फिर भी तेरे ही उमंग में मैं न खिल पाई ... हे हरि... जो तेरी रुचि हो  वही इन प्राणों की गति हो  हे नाथ मेरे श्याम  मेरे कृपालु रघुराई ... श्री राधा  🙇‍♂️🌹🙇‍♂️

pain

Pain is a process of releiving self from pain     Pain is what we don't want but we get ... What we want to hold but we cannot catch .. Pain *releives* us  from the unwanted desires     Desire is in itself Pain  🙏🙇‍♂️🌹

गुरु कृपा

*गुरु कृपा* *दुर्गम काज जगत के जेते*             *सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते* जब श्री गुरु के करुणा भरी दृष्टि शरणार्थी शिष्य पर पड़ जाती , तो उसे स्वानन्द के लिए कुछ करना नही पड़ता । गुरुदेव की करुणामयी दृष्टि अपने नयनो से उस आनन्द का बोध कराती है । आनन्द का दर्शन करुणा के नयनो से होता है  अपने  निज आनन्द के  भोग  में कभी स्वामी का आनन्द नहीं बनता ।  एक करुणा ही है जो स्वयं के स्वाद, स्वसुख का लोभ आने नही देती । प्रकृति करुणा में ही सब को बांट रही  और स्वार्थ हृदय निज सुख में संजो रहा । भिन्न स्वभाव एकात्म होने नहीं देते  एकभाव स्तिथ रहने नही देते  वरना जितनी सहजता प्रकृति में बनी है उतनी ही सहजता भीतर भी रहती प्रमुख बात की आनन्द का भोग करना आनन्द का स्वयं के लिए  लालसा रखना , हृदय को निर्मल नही रहने देता । स्वार्थ की परत चढ़ते ही कठोरता  की दीवारें बढ़ने लगे जाती है । प्रेम का एक ही स्वभाव वह है करुणा  प्रेम करुणा में पलता है  करुणा से खिलता है । करुणा का दर्शन न कर पाने वाली दशा याचना करती है। और प्र...

सत्य सेज

सत्य के सेज पर प्रेम का पुंज खिले  सारे भेद की भीड़ एक क्षण न टिके तू ही सत्य तू ही सेज  तू ही पुंज तू ही प्रेम      तुझमे तू तुझमे ये  फिर भी काफिर ,खोजता रहे  श्री हरिदास  जय जय श्री ललित महोत्सव

प्रेम द्वेष

*प्रेम द्वेष*    स्मृति और कल्पना के मध्य में जब हमारी दशा रहने लगती है .. तब चाह और अफसोस  चिंता और भय  दुख और नफरत में तीसरा विकार प्रेम में द्वेष ,उत्पन्न हो जाता है, जो प्रेम के स्वरूप को विकृत कर देता है  अर्थात जिस हृदय में द्वेष उत्पन्न होने लगता है, उधर प्रेम नहीं ठहरता I  द्वेष बीती बातों से, चाह( अपने अनुकूल व्यवहार) न पूरा होने से आ जाता है,  द्वेष में अफसोस और ईर्ष्या रहने से प्रेम सहज त्याग कर देता है उस हृदय को I  संसार मे जिसके प्रति हमारा द्वेष सिद्ध हुआ है उस उस व्यक्ति वस्तु देश काल परिस्तिथियों का हमसे  सहज त्याग ही हुआ है I  क्योंकि दोष देखना ही द्वेष है  जिधर दोष उधर प्रेम अपनी  उन्मत्त अवस्था को खो देता है I  प्रेम स्थिर रहते हुए भी उन्मत्त है I      भूत और भविष्य में  प्रेम नहीं  प्रेम तो वर्तमान की स्तिथि हैं इस हेत नित्य नवीन है I  कल्पना और स्मृति यह ही भूत और भविष्य है जिनके चिंतन से वर्तमान बिगड़ता है I  नित्य नूतन दिवस है  जो दिन बीत ग़या वो लौटेगा नहीं...

प्रेम प्रणाम

🪷 प्रेम प्रणाम 🪷 प्रेम का एक में  एक  होकर भी और और एक मे एक भरते रहने की मचलन तड़पन प्रकम्पन यही तो प्रेम का अभिवादन प्रेम का प्रणाम है I       नित्य नित्य इस प्रणाम से प्राण प्राण को प्रणाम  मेरा हो .. रस की रसिकता को मेरा प्रणाम हो .. रसिक रसीली को मेरा प्रणाम हो .. आह री ..    रंगीली रस तुलिके  प्राणों की  प्रेम चित्रलिपि     और और सरकती रहो थिरकती रहो अनुराग रंगो में अनुराग वीटिका  के आह्लादित स्पन्दनों में I  जय जय  प्रेम के महोत्सव प्रेम प्रणाम को ...

प्रेम इंद्र धनुष

*प्रेम इन्द्रधनुष* चाहत के आँच में        नव नव मनोरथ पकै.... अंगों में उमंग लिए         लाड़ में लाड  मिलै... अंग रंग अनंग भीने          दुलारो के राग बढै... प्रेम घटा के आकाश मण्डप में          रोमांचो के स्वर सजै... इन्द्रधनुष के सप्त रागों में           चाहत के सतरंगी रंग झूलै.. श्री हरिदास  🙇‍♂️🙏🙇‍♂️