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Showing posts from August, 2021

मेरे प्रेम जू

मेरे प्रेम जू हे कन्दर्प रेख रस रंजत नयन युगल मेरे प्रेम जू  मैं क्या हूँ या क्या नहीं इतना विचार विवेक मुझमे नहीं    पर इतना जानती तुम्हारी हूँ तुमसे हूँ तुममें तुम्हारा प्रेम अभंग हूँ ..    छोटी सी तुम्हारी प्रेमांकुर के मुक्त प्रसर से झरी एक चपल झरण हूँ ..   चाहती तुम्हारा वही घनीभूत ललित संग हूँ  हे मेरे प्रेम.. मम जीवनम  इस  जीवन की क्रियाशीलता में जड़ न हो जाऊँ .. सदैव स्मृत कराना कि मैं वही प्रेम चेतना से भरा हुआ रंग हूँ ... श्री वृंदावन  श्री श्यामा श्याम 🌷🙏🌷

return to innocence

*Return to Innocence* ***************************** Hail ,all hail to you my glorious lord krisna 🌷🙏🌷 When I practising you in myself  I started worshipping you in statues ..    I found then ,you peeping me inside my heart  When I started experiencing you in me  I started admiring your spiritual knowledge  I found then , Abundance of blessed blisses blooming in my heart Yes ,vital energy of my life    This was the moment that I   found you not only in me but each and every where ..     In my deeds in my words in my emotions in my life and in my  eyes raining droplet tears .. Alas!! I found you my krishna       You are my adorable sensation .. That what I feel only you are near  Only you are near ... Shri Vrindavan  Jay jay Shri Shyama shyaam  🌷🙇‍♀️🙏

मधुरता की ओर

मधुरता की ओर तुम्हारी आनंद हास्य युक्त मुख राशि का प्रतिबिम्ब हृदय में झलकता पाया  जब तुम्हारे श्री विग्रह का पूजन कर तुमको अपने जीवन में चाहा .. सुखद ज्ञान ज्योति की निर्मल धारा कृपावत निर्झर बहता पाया  जब तुम्हारे अनुभव हेतु अपने मन को गुरु चरणो में लगाया .. हाँ मेरे श्रीनवरस की मूर्ति विमल   श्री मदन मोहन किशोर नवल  तभी मैंने तुम्हें सर्वत्र व्याप्त पाया  तन मन वचन न शेष थे तुमसे  अखिल भुवन कुलभूषण श्री नंदनंदन को ही अपने सजल नेत्रो से प्रेम पूरित अश्रुओ में बहता पाया ... जय जय जय जय  मैं करती उसी शशि दीप का वंदन  जिसको मैंने अपने प्रेम उमंगो में सदैव निकट अखंड उज्जवल रस के आनंद महानन्द में लहराता पाया .. श्री वृंदावन  श्री श्यामा श्याम 🌷🙏🌷

प्रेम जीवंत

प्रेम जीवंत प्रेम तो है  पर प्रेम तभी जीवंत होता हैं जब उसमें केलि हो  प्रेम किलोल से ही प्रेम जीवंत होता है गौर श्याम तभी सुखी होते जब उनकी प्रेम भुज लताएँ परस्पर आबद्ध रहती हैं  प्रेम से प्रेम का स्पर्श और और मीठा सघन और और आलोडित प्रमोदित प्रफुल्लित रसीला होता जाए यह ही प्रेम की रुचि और प्यास है अपनी इस चाह को प्रेम अनंत सखियाँ अनंत कुंजे अनंत विलास में रच देता है। यह सृष्टि प्रेम का ही तो विलास है।  प्रेम जीवंत ही विलास में होता है। इसीलिए यह बिहार और विलास प्रेम का अभंग अंग हैं ,प्रेम की सम्पूर्णता है  जो सिर्फ़ युगल रस के प्रेमी उपासक प्रियाप्रीतम के कृपापात्र ही अनुभव कर सकते हैं  अन्य के बस मे न यह अद्भुत परा ज्ञान ,प्रेम के वश में सब कोई  पर प्रेम किसी के वश में नहीं      प्रेम की कृपा प्रेमसहेली ही प्रेम की सेवा कर सके समझ सकती है समझा सकती है अनुभव करा सकती है। प्रेम को जीवंत रखती प्रेम सहेली     प्रेम की रुचि और प्रेम की वृद्धि की सेवाओं में किलोलित रहना सखी का जीवन है और यह  प्रेम सहेली इसी से जीवंत रहती ...

पवित्रा पर प्रियतम को प्रेम संदेश

पवित्रा पर प्रियतम को प्रेम संदेश आज मेरी लेखनी को ही अपनी प्रेम दूतिका बनाकर यह भाव पत्रिका प्यारे प्रीतम तक पहुँचा रही हूँ ... दूर देश मे रहती एक सहेली का भाव कहती अपनी प्रेम सहेली से :- हे मेरी प्रेम सहेली तुम मेरी भी यह पवित्रा मेरे प्राण प्रेष्ठ को पहना आना  बाँधने से पहले मेरा स्मरण करा देना  कहना की यह ख़ाली सूत्र न ,इसके एक एक सूत में प्रेम रक्षा का प्रण भरा है .. हे मेरी दूतिका  सजना को उनकी सखी का हाल सुना आना  कह देना की उनकी ख़ुशी में उनकी सहेली का सुख है उनके उत्साह में मेरी उमंग हैं  हे प्रेम संदेश वाहिका .. यह विशुद्ध हृदय के संग के उमंग का मीलित उत्सव है पवित्र सम्बंध की रक्षा की माँग है यह कुछ और नहीं युगल भावनाओं के संगम का अनुसंधान है.. हे मेरी दूतिका  जब यह संदेश ले जाना तो तुम स्वयं संदेश हो जाना  न पत्र न तुम बस स्वयं मेरी बात हो जाना  उनकी कलाई पर यह प्रेम पवित्री बाँधते बाँधते ,मेरी संवेदनाओं को ही बाँध आना.. धीरे धीरे मेरी अधीरता ही बाँध आना  धैर्य से उन्हें भी बेचैन कर आना.... श्रीश्यामाश्याम

भक्ति की मधुरता

भक्ति की मधुरता भक्त को चिंता नहीं की  मैं पुकारू तो वे सुनेंगे की नहीं    अपने मन की मैं जानू  पी के मन की राम साँसों की माला से सिमरूँ मैं पी का नाम न ही चिंता उसे पहुँचने की .    क्योंकि भक्ति कभी माँगती नहीं  क्योंकि उसे तो सिर्फ़ अपने इष्ट अपने आराध्य अपने प्रियतम का ही सुख चाहिए .. काश कभी मोहब्बत मे वो मुक़ाम आए  की चोट तुझे लगे और ज़ख्म मेरे नाम आए यही तो भक्ति की मधुरता है मिठास है  की स्वयं का कोई सुख शेष नहीं  नाम रस मे इतना भीग भीग कर मधुरता का आस्वादन कर रहा की उसे संसार के सुख सुविधा भी दुविधा ही लगते है  सुख के माथे सिल पड़े जो नाम को भुलाए  बलिहारी उस दुःख की जो गोविंद नाम रटाए रसना फुटौ जो अन्य रटौ निरख अन्य फुटौ नैन  श्रवण फुटौ जो अन्य सुनौ  बिन राधा जस बैन... यही तो भक्ति (प्रेम) का व्रत है  सुविधा मिले न मिले पर हृदय में मधुरता ज़रूर भर देती है श्री भक्ति श्री प्रीती  श्री वृंदावन

इबादत और मोहब्बत

इबादत और मोहब्बत हम इबादत करते हैं   वे मोहब्बत करते हैं     इबादत एक मुक़ाम तक बात बनाती है पर आगे का रास्ता मोहब्बत ही बनाती है ...    उनकी मोहब्बत ही हमको उनतक पहुँचाती हैं उनका कर देती हैं  जहाँ स्वयं भी शेष नहीं रहा  वही मोहब्बत मोहब्बत सिर्फ़ मोहब्बत रह गई ..

प्रेम का मान

प्रेम का मान एक नवीन आनंद  तुझसे उठी तेरे दिल की चाहत को मैं जीता हूँ  फिर भी प्यारी तुम किस कारण मान करती हो .. एक ही तन मन रंग में रंगे एक ही विलास के रसिक हम दोनो  फिर भी प्यारी अन्य हठ क्यों करती हो .. न मेरा हित न प्यारी जू तुम्हारा  हम दोनो के एक मनोरथ फिर किस कारण से रूठ में ना ना कहती हो .. हरिदासी सखी श्री प्रिया प्रीतम की इस मधुर प्रीति का अवलोकन करती हुई हितैषी सखियों से कहती हैं :-   प्रेम में प्रेम का ही हित है अन्य कोई हित प्रेम में या प्रेम का है ही नहीं .. प्रेम से अलग चाह या अन्य हित उठने पर ही प्रेम में मान ,प्रेम के पोषण हेतु ही मान स्वतः प्रकट हो जाया करता है अन्य चाहत ही प्रेम का शोषण है मान से प्रेम अपने प्रेम को सुरक्षित कर उसकी तुष्टि पुष्टि और वृद्धि करता है.. आह सखी यह प्रेम पावस की रिम झिम कितनी सुहावनी है इनकी फुहारों में भीगने का आनंद  भी है और थमी रुकी वर्षा पर और और भीगने का इंतेजार परस्पर प्रेम करता मनुहार भी है .. यही तो प्रेम का नवीन आनंद है सखी

निराला प्रेम

निराला प्रेम प्रेम की बात कितनी निराली सखी .. प्रेमी ही सर्वोपरी पात्र आदर का .. और आदर ही तुच्छ प्रेम में ,   ओह विचित्र मर्यादा इस प्रेम की  श्री हरिदास  🙇‍♀️🙏🌷

मान का कारण

मान का कारण भी रस अतृप्ति आश्चर्य है कि पूर्ण प्रेम अतृप्त ही रहता है ..यह अतृप्ति ही प्रेम को नवीन रखती है नव नव रूप , श्रृंगार , और रसमयी केलियों के लिए ललायित रखती है और सखी इसी रस की वृद्धि  हेतु  प्रेम में सहज मान प्रकट रहता है ,रस पोषण हेतु रूठ रूठ कर और रसीला रसायमान हो जाना यह धीर प्रेम की  चंचल गति है ... श्री वृंदावन

प्रेम रूस

प्रेम रूस प्रेम की विचित्रता तो देख सखी     इधर रूठा भी उसी से जाता जो उनके प्रेम में अधीन हुए बैठे हैं ।    सच कहती हो जिधर अपनापन होगा उधर ही मान का स्वाँग होगा ..स्वाँग अर्थात लीला  ओह यह प्रेम भी न बहुत चतुर है अपने रस पोषण हेतु सब ज्ञान रखता है।     तभी तो प्रेम उधर ही झुकता है, जिधर उसे अपने लिए पूर्ण समर्पण दिखता है। प्रेम का न्योछावर तो प्रेम ही है सखी ..जो अधीन हो चुका है..हरा जा चुका है ..हर लिया गया है ..सखी वह ही तो प्रेम का खिलौना है    खिलौना ही तो अधीन रहवे न सखी  और जो अधीन है ..उन्ही से सहज अपनापन है और अपने से ही रूठने में आनंद भी और अपनेपन का भावपोषण भी ... श्री हरिदास🌺🙏🌺

भाषा भाव इशारा

भाषा...भाव इशारा तरंगो का रूपांतरण .. भावनाओं का स्पंदन ..         भावों का इशारा ..,          यह ही है भाषा कि परिभाषा ... सखी !!! भाषा मात्र शब्दों की रचना नहीं ..   भाषा तो भाव का इशारा हैं प्रेमास्पद का ,जो सिर्फ़ प्रेमी समझ पाए  प्रेम को प्रेम ही समझे  जब उनकी तरंग मेरी उमंग  मेरी उमंग उनकी तरंग हो जाए ..   सखी यह ही हृदय से हृदय की एक बात हो जाए तो यह ही भाषा की परिभाषा कहलाये .. भाषा है क्या ? भावनाओं का स्पंदन .. स्पंदन है क्या ? तरंगो का उमगन ..    यह उमगन है क्या ? झूमती दशा ..प्राण का उमंग  सखी यह उमंग है क्या ?  प्रेम रस रंग री बाँवरी ...      और यह रसरंग तरंग उमंग सब वही है .. रसों वै सः  हाँ सखी प्यारी .. देखो रस से रसात्मक भाषा का प्रादुर्भाव अर्थात प्रेम से प्रेम ही प्रकट है। सो हर वर्ण अलंकार शब्द आदि ..का अपना अपना  रस है रंग है,क्योंकि प्रेम  से स्फुरित ,प्रेम से ही उद्भूत है       सखी प्रेम के इलावा शेष कुछ न .. प्रेम से जपो...