Posts

Showing posts from July, 2021

गुरु कृपा प्रसादी

गुरु कृपा प्रसादी                 भाव प्रकाश  गुरु द्वारा प्रदत्त नाम को जब आप गहराई में लेकर नाम के साथ एकाकार हो कर अंदर ही अंदर हृदय से रटने लगते है ..नाम सहारे गहराई में उतरते हैं  तब सिर्फ़ एक गुरु तत्व की अनुभूति होती है। अंदर का मौन ही सत्य अनुभवित होने लगता हैं ।इंद्रियो से देखी सुनी कही सब स्वप्न वत अनुभव होने लगती हैं । जब तक ऐसा बोध अनुभव नहीं होता आप अपने अंदर के प्रेम को पहचान नहीं सकते ... गुरु तत्व के बोध के उपरांत प्रेम तत्व की अनुभूति है।प्रेम बिन ज्ञान ठहर नहीं पाएगा ..रिस जाएगा ... आत्मनुभूति के बाद प्रेमनुभूति अनिवार्य हैं चेतना के पूर्ण विकास हेतु ।जब तक हृदय करुणावान  बुद्धी सम नहीं होती  माया के साथ राग द्वेष का बंधन बना ही रहेगा ।     इसीलिए प्रेम सर्वोपरि लक्ष्य हैं प्रेम ही सेवा और साधन हैं प्रेम ही नियम और तप है।क्योंकि प्रेम की अनुभूति पश्चात जगत में हमारा  द्वैत ठहरता ही नहीं ।      प्रेमी संग में भी एकांत हैं इसीलिए वह शांत चित समवान हुआ अपने हृदय बिहारी से निरंतर एक़र...

भाषा भाव इशारा

भाषा...भाव इशारा तरंगो का रूपांतरण .. भावनाओं का स्पंदन ..         भावों का इशारा ..,          यह ही है भाषा कि परिभाषा ... सखी !!! भाषा मात्र शब्दों की रचना नहीं ..   भाषा तो भाव का इशारा हैं प्रेमास्पद का ,जो सिर्फ़ प्रेमी समझ पाए  प्रेम को प्रेम ही समझे  जब उनकी तरंग मेरी उमंग  मेरी उमंग उनकी तरंग हो जाए ..   सखी यह ही हृदय से हृदय की एक बात हो जाए तो यह ही भाषा की परिभाषा कहलाये .. भाषा है क्या ? भावनाओं का स्पंदन .. स्पंदन है क्या ? तरंगो का उमगन ..    यह उमगन है क्या ? झूमती दशा ..प्राण का उमंग  सखी यह उमंग है क्या ?  प्रेम रस रंग री बाँवरी ...      और यह रसरंग तरंग उमंग सब वही है .. रसों वै सः  हाँ सखी प्यारी .. देखो रस से रसात्मक भाषा का प्रादुर्भाव अर्थात प्रेम से प्रेम ही प्रकट है। सो हर वर्ण अलंकार शब्द आदि ..का अपना अपना  रस है रंग है,क्योंकि प्रेम  से स्फुरित ,प्रेम से ही उद्भूत है       सखी प्रेम के इलावा शेष कुछ न .. प्रेम से जपो...

प्रेम रुस

प्रेम रूस प्रेम की विचित्रता तो देख सखी     इधर रूठा भी उसी से जाता जो उनके प्रेम में अधीन हुए बैठे हैं ।    सच कहती हो जिधर अपनापन होगा उधर ही मान का स्वाँग होगा ..स्वाँग अर्थात लीला  ओह यह प्रेम भी न बहुत चतुर है अपने रस पोषण हेतु सब ज्ञान रखता है।     तभी तो प्रेम उधर ही झुकता है, जिधर उसे अपने लिए पूर्ण समर्पण दिखता है। प्रेम का न्योछावर तो प्रेम ही है सखी ..जो अधीन हो चुका है..हरा जा चुका है ..हर लिया गया है ..सखी वह ही तो प्रेम का खिलौना है    खिलौना ही तो अधीन रहवे न सखी  और जो अधीन है ..उन्ही से सहज अपनापन है और अपने से ही रूठने में आनंद भी और अपनेपन का भावपोषण भी ... श्री हरिदास🌺🙏🌺

मान का कारण भी रस अतृप्ति

मान का कारण भी रस अतृप्ति आश्चर्य है कि पूर्ण प्रेम अतृप्त ही रहता है ..यह अतृप्ति ही प्रेम को नवीन रखती है नव नव रूप , श्रृंगार , और रसमयी केलियों के लिए ललायित रखती है और सखी इसी रस की वृद्धि  हेतु  प्रेम में सहज मान प्रकट रहता है ,रस पोषण हेतु रूठ रूठ कर और रसीला रसायमान हो जाना यह धीर प्रेम की  चंचल गति है ... श्री वृंदावन

मुस्कुराहट

मुस्कुराहट  श्रृंगार रस सार ......खिलखिलाहट नव केलियों के सुआगमन की ख़बर लाती मुस्कुराहट .. हाँ सजनी यह मुस्कुराहट .... नवीन केलि कौतुकों के उमगते भावों को खिलाने आती यह मुस्कुराहट  हाँ सखी यह नवल मुस्कुराहट .. प्रीती  का प्यार ,प्रकृति का विलास ,रोमांचित अट्टहास यह मुस्कुराहट .. विस्मृत को भी आत्मविस्तृत कर देती उज्ज्वल उज्ज्वल मुस्कुराहट .. विजय का डंका लेकर घूमती विचरती सूरत मैदान में यह मदमाती मुस्कुराहट .. हाँ सहेली यह मुस्कुराहट .. रति केलि का प्रथम सोपान  युगल मिलन की प्रथम रति कला यह मुस्कुराहट .. श्रृंगार रस में सजी .अनुरागी रस पिलाती यह खिली मुस्कुराहट .. समस्त विहार का आहार  प्रेमी का जीवन प्रेमास्पद की मुस्कुराहट. हाँ युगल सहचरी यह मुस्कुराहट ... मदन कलाओं की कुशलता युगल प्रेम का मधुर मौन संदेश यह मुस्कुराहट .. ऐ री सखी तुम जानती हो यह मुस्कुराहट क्या है !!!!    यह दो रस प्रसूनों की फूलन दशा है..                 रस पंखुड़ियों के झूमने का समां है .. यह श्री प्रिया जू का निज  प्रेम श्रृंगार है...

आदर

आदर आदर का अर्थ प्रणाम या सत्कार नहीं  आदर का अर्थ की अपने इष्ट की किसी भी बात का अनादर न हो     हर बात का उनका स्वागत हो हर्ष से ,यह ही आदर है। आदर भी उधर ही होता है जिधर पूर्ण प्रेम है । प्रेम में ही आदर है और सत्कार  और स्वागत है ... श्री हित हरिवंश जू का प्रथम पद      जोई जोई प्यारों करे सोई मोहि भावे जो प्रेमास्पद की रुचि है वही मेरी भी रुचि  यह प्यार है और यह ही आदर भी  श्रीश्यामाश्याम 🙏🌺🙏

आश्रय बल

आश्रय बल यह इतनी बड़ी सिद्धी है साक्षात कृपा की भी कृपा है कि अगर आपका दृढ़ आश्रय स्थित स्थिर रह गया है,तो एक मात्र इस आश्रय से प्यारे आपसे रीझे है ...प्रभु आपका साथ कभी न छोड़ सकते हैं ...     पर जिनको प्रभु के इलावा अन्य धर्म कर्म पर किसी व्यक्ति विशेष पर भी आश्रय हुआ  तो यह व्यभिचारिणी भक्ति है साधन भजन न भी जिसका ढंग से चल रहा पर हरि का आश्रय उसमें ज़बर्दस्त है...मात्र इस भाव से प्यारे रीझ जाते हैं ।   वे अपने शरणागत का साधन भजन से ज़्यादा उसकी आत्मीयता पर ग़ौर करते हैं  यह सभी साधन तो उनसे अपनी एकता सिद्ध करने के लिये ही है न ... सो सार साधन है ,साधन भजन का मधुर फल एकमात्र अनन्य आश्रय श्री हरि के ।। श्री वृंदावन

रस चाह

रस चाह तुम अधीर न होगे श्याम रस     तो कैसे गौर रस बरसेगा .. तुम न चाह करो प्यार की      तो कैसे प्रेम फ़ूल खिलेगा .. तुम प्यास हो  प्यारी मेरी पानी      तुम न प्यास बढ़ाओगे तो  रस सागरी का भरा रस कैसे उमड़ेगा .. प्यार को प्यासा चाहिए  और प्यास को भी प्यार ..      एक ही सुख रूप दोनो  खेलो न फिर और और रस विलास ..

श्रृंगार सार

श्रृंगार सार        प्रशंसित कौतुकी स्मित मुस्कान हे री सखी ,श्री प्यारी जू की उज्ज्वल मंद स्मिता महा श्रृंगार राज रस है    उनके इस प्रसंशित उज्ज्वल मुस्कान के कौतुक में  रहस्य पर रहस्य है .. श्री प्यारी जू का श्री प्यारे को देखकर मुस्कुरा देना मानो श्रृंगार पर श्रृंगार सजाना है ... उनकी एक मुस्कान हित मई और हतप्रभ कर अचंभित कर देती, अनंत सुख विलास रच देती श्री प्यारी जू की इठलाती लजाई सी मुस्कान .. नवीन केलियो के रोमांच मे उत्सव रचने ले चलती श्री चपलाँगी जू की चपल मुस्कान .. प्यार को सजाने हेतु मधुर ताप के निवारण हेतू बिखेर देती श्री उज्ज्वले अपने अधरों पर श्रृंगार मुस्कान .. देखो सखी मुस्कुरा कर रस भीजन हेतु रस का आवाहन करती  श्री घन दामिनी की मधुर तान मुस्कान ... अरि सखी और सुन .. श्री मुग्धा के मुस्कान का रहस्य !!!  कोक कला मे निपुण प्रवीना प्रीतम देखी देखी मुस्क़ात    समझ इशारा श्री प्रीतम प्यारे स्नेह रस भीजन हेतु ललचात  भृकुटि जन्य भाव तरंग गतियां दे दे श्री लाल को उकसात मुस्कान रहस्य  श्री प्यारी का मुस्कुराना पावस...

भाव प्रकाश

गुरु कृपा प्रसादी                 भाव प्रकाश  गुरु द्वारा प्रदत्त नाम को जब आप गहराई में लेकर नाम के साथ एकाकार हो कर अंदर ही अंदर हृदय से रटने लगते है ..नाम सहारे गहराई में उतरते हैं  तब सिर्फ़ एक गुरु तत्व की अनुभूति होती है। अंदर का मौन ही सत्य अनुभवित होने लगता हैं ।इंद्रियो से देखी सुनी कही सब स्वप्न वत अनुभव होने लगती हैं । जब तक ऐसा बोध अनुभव नहीं होता आप अपने अंदर के प्रेम को पहचान नहीं सकते ... गुरु तत्व के बोध के उपरांत प्रेम तत्व की अनुभूति है।प्रेम बिन ज्ञान ठहर नहीं पाएगा ..रिस जाएगा ... आत्मनुभूति के बाद प्रेमनुभूति अनिवार्य हैं चेतना के पूर्ण विकास हेतु ।जब तक हृदय करुणावान  बुद्धी सम नहीं होती  माया के साथ राग द्वेष का बंधन बना ही रहेगा ।     इसीलिए प्रेम सर्वोपरि लक्ष्य हैं प्रेम ही सेवा और साधन हैं प्रेम ही नियम और तप है।क्योंकि प्रेम की अनुभूति पश्चात जगत में हमारा  द्वैत ठहरता ही नहीं ।      प्रेमी संग में भी एकांत हैं इसीलिए वह शांत चित समवान हुआ अपने हृदय बिहारी से निरंतर एक़र...

रस बोध में देरी क्यों

रस बोध में देरी क्यों ?? रस का रस में सिर्फ़ आकर्षण है, रस की रुचि सिर्फ़ रस है और जीव का जड़ में आकर्षण रहने से रस बोध ,रसानुभूति नहीं हो पाती  उपासक से एक त्रुटि हो जाती  वह इम्प्रेस हो जाता बहुत जल्दी  यह ही इस मार्ग का सबसे बड़ा छिद्र  हमारा रस स्वयं हमारे भीतर हैं  रस को  मौक़ा दो खिलने का  पर जीव भाव यह होने न दे  कही न कही  किसी न किसी से बन्धता चला जा रहा है, किसी से प्रभावित होना  यह आपके रस भावों की हानि करा देगा इसीलिए जड़ संसार के विषय व्यक्ति से प्रभावित न होवें एकमात्र युगल में आकर्षण और रुचि और मैत्री भाव सभी से  पर दिल का लुटजाना तो सिर्फ़ अपने निज रस के लिए हो   भाव संजीवनी सखी की ठाट हम क्यों किसी से प्रभावित हो क्यों किसी को इम्प्रेस करें जब हमें किसी से कोई चाह नहीं .. मेरे एकमात्र छाप मेरे प्राण युगल रस हैं और निरंतर मेरे अंग संग हैं  तो फिर बाहरी मनुहारी क्यूँ ????

प्रेम और आदर

प्रेम और आदर    बस इतना ही शेष रह जाये जीवन में  तो रस ही शेष रहा न ... कुछ करना भी न पड़ा  जोड़ना भी न पड़ा ..    सिर्फ़ प्रेम और नेम की मेड में स्थिर रहना पड़ा .. सावधान और स्थिरता  यह इस साधना के प्रमुख अंग  भाव स्थिरता  और कुसंग से सावधानी

रस स्वभाव

रस स्वभाव सखी रस का अद्भुत स्वभाव!!!! एक ही रस , स्त्रैंण में गम्भीर होता है , और पुरुष में अधीर और उतावला हो जाए  विचित्र बात इस रस की सखी !!! तभी रस नायिका गम्भीर होती हैं  और रस नायक अधीर और प्रेम उतावला । इसी कारण श्री लाल ज़ू में सदैव रस आवेश ,प्रेम आवेश रहता हैं  और प्रिया जु का प्रेम उनके आवेश के कारण और और गम्भीर होता रहता है        गम्भीर क्यों है ?? जानती हो सखी  श्री लाल सदैव शिशु रस हैं श्री प्रिया के ,सोचो एक  छोटी मीन  क्या सम्पूर्ण सागर को थाम पाएगी  क्योंकि वह ख़ुद सागर के भीतर है बस सागर की लहरों से खेल सकेगी पर सागर को झेलने की सामर्थ्य न उसमें     इसी कारण श्री प्रिया का प्रेम गम्भीर हैं !!!! श्री वृंदावन 🙏🌺

पूर्ण आराधना

पूर्ण आराधना श्री प्यारी के ख़्याल में खो जाना ही सभी तीर्थों के जल में डुबकी लगाना है .. श्री प्यारी के लीलाओं का चिंतन ही श्री वृंदावन में रमण करना हैं .. श्री प्यारी के लिए व्याकुलता ही पारंगत भाव हैं ... श्री प्यारी की सेवा ही श्री प्यारे का पोषण है .. श्री प्यारी से आत्मीयता ही वास्तविक प्यार है... हर भावो से प्यारी को दुलारना यह ही रस सार है.. मेरी लाड़ली को सदा लाल के लाड़ के संग रखना यह ही अति निज सेवा और उज्जवल ब्रज भाव है..

साँची प्रीत

साँची प्रीत मेरे ,तेरे भीतर रहते मेरे श्याम सुंदर    हर हाव भाव को पढ़ रहे जान रहे होते वे , न जाने कब कौन सा भाव कौन सी बात उन्हें लग जाए  और कौतुकी श्याम  कोई नया कौतुक रचे जीवन में      घबराता नहीं है प्रेमी ..क्योंकि उसे  अब तो कोई आशा भी नहीं कोई  वस्तु व्यक्ति की पकड़ की ..न उनके प्यार और संग की ....   प्रेमी जानता हर दिल्लगी को वे तमाशा बनाते हैं , इसी कारण से प्रेम जगत  का अपूर्ण रह जाता      वे एकमात्र प्रेम भोगी हैं हम उनका भोग         वे अपना भोग बाँट के खाते पर कोई भोग ऐसा होता जो वे किसी को नहीं बांटना चाहते हैं  जैसे की शबरी के बेर  सुदामा के तंदूल  आदि ..आदि ..    अगर तुम उनका वह भोग हो तो संसार में असफल होगे  संसार के प्रेम में रुचि ही ख़त्म हो जाएगी  चाहे तुम्हारे लिए कोई प्राण भी देने को तैयार हैं  पर तुम उसके प्रेम का उतना आदर न दे पाओगे  क्योंकि तुम्हारी रुचि ख़त्म हुई है संसार के वस्तु व्यक्ति में    और अब शुरू होगी गा...

भजन सार

भजन सार समस्त भजनों का सार   श्री युगल किशोर श्रीश्यामाश्याम का नित्य बिहार मय भजन .. समस्त अभिलाषाओं का  सार    नित्य बिहार का चिंतन .. समस्त सुखों का सार प्रेम विवश दशा में निरखन .. समस्त आश्रय का सार श्री इष्ट के नाम का स्मरण .. समस्त साधनों का सार चित्त का उपशमन .. समस्त नियमों का सार श्री  रसिको का सत्संग ,शुद्ध रस मय भजन ..

भाव फूल

भाव फ़ूल रस की अनन्यता , रस की एकाग्रता  भावना की एकाग्रया हो  न अन्य अभिलाषा और बाहर ऊर्जा का बहाव न हो तो       तो महाभाव के फ़ूल खिल पाते हैं  यह रसिको के जीवन के नियम हैं  रस अनन्यता मात्र रस मय स्थिति यह फ़ूल जब खिलेगा तो कोई भँवरा भी आएगा इसका रस चखने      पर जानेंगे कैसे की फ़ूल खिला हैं  जब कलेजा ,हृदय गीला गीला शीतल शीतल मधुर सा अनुभव होगा       तब अंदर की प्रेम शाखायें तुष्ट पुष्ट हो कर कुमुद रूपी स्नेह फ़ूल खिला रही हैं और खिलते ही उसकी भूमि के आर्द्रता की महक फ़ूल की ख़ुश्बू भँवरे को स्वयं आकर्षित कर लेगी .. रस के अनुराग में नव नव रास विलास उल्लास आह्लाद उठेगा .... जय जय श्री श्यामा श्याम 🌷

प्रेम अभंग

प्रेम अभंग श्री प्रियतम जू का सेज श्री प्यारी जु का अंग .. श्री प्यारी जू का ओढ़ना श्री प्यारे जु का अंग .. श्री प्यारी का श्रृंगार श्री प्यारे जू का मन  श्री प्यारे जू का सुख श्री प्यारी जु का संग .. अंग संग रस मग्न पौढे प्रेम रंग .. रूप पुंज में रस पुंज बिहरे निसंक .. शिशिरता  में उष्णता भरे, फूले सुअंग  आनंद की लहरी में झूमे सारंग  खिले मिले झरे डहे..  रोम रोम हरे भरे    छिन छिन, और और ,विलसे प्रेम अभंग ...