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Showing posts from November, 2022

प्रेम और मोह

*प्रेम और मोह* प्रेम और मोह में बहुत फर्क है ... मोह साथ छोड़ देगा  पर प्रेम निभना जानता है  अपने प्रेमी के द्वारा उसके प्यार का तिरस्कृत किये जाने पर भी  प्रेम प्रेमी का द्वार नही छोड़ता  जबकि मोह अभिमानी है सँग छोड़ देता है । कौन समझेगा प्रेम को आजकल  सब प्रेम के नाम पर औपचारिकताएं निभाते है । उन्हें पता ही नहीं एकांत हृदय ही प्रेम का घर है । इधर तो हृदय  को धर्मशाला बनाये  प्रेम के मेहमान की आशा रखते है । मोहित इधर सब  प्रेमी कोई नही  चाहत पूरी हो आधी नही .. वरना ये छटपटाहट और बेचैनियां प्रेम में कभी मिलती ही नही !!! असुअन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई ... अब तो बेलि फैल गयी आनन्द फल होई ... श्री वृन्दावन 🙏🙏🙏

ब्रजवासी कौन

*ब्रजवासी कौन* जिसका हृदय ही प्रेम हो गया हो  वही प्रेम धरा ब्रज भूमि का निज जन हो गया है । भक्ति प्रेम के अभाव में कठोरता और कालुषय से भरा हृदय ब्रज में रहकर भी ब्रज में  न होने के सामान्य है । अतएव ये दिल ही वृन्दावन जहाँ निरन्तर अपने आराध्य  प्रेमी का ही स्मरण है । श्री वृन्दावन 🙏🙇‍♂️🙏

प्रेम उपचार

*प्रेम उपचार* औपचारिकताएँ और प्रेम साथ नही चल सकते। प्रेम जब चलता है तो अकेले चलता है  इसी कारण प्रेमी अटपटा होता है । कारण संसारी शिष्टाचार ज़्यादा देखते और पसन्द करते है । प्रेम का उपचार भी यही है की जो वो नही है , उसका कदापि सँग भी न हो ,तभी प्रेम अपने में गरजता हुआ गतिमय होता है। बाधा है नही कही बस असहजता ही बाधा बनी पड़ी इसकी ।

विवेक के फूल

* *विवेक के फूल* निर्ब्याज अनासक्ति की गोद मे पलने खेलने वाला वैराग्य ही श्री हरि की प्रसन्नता का कारण हो सकता है ,    अगर वैराग्य ऊपर से ओढ़ा हुआ है और भीतर से आसक्ति रूपी डांकिनी बैठी हुई है ,तो वह व्यक्ति को हर समय गंदगी में ही मुँह डालने को विवश करती रहती हैं ,और ऐसी हालत में भी वो साधक कई कई जन्मों के बीत जाने पर भी श्रीहरि की तरफ पीठ किये बैठे रहता है , साधक जब अपने को सर्वोपरि मानने लगता है और श्री गुरु का भी महत्व चला जाता है उसके मस्तिष्क से अहंकार के कारण  और श्री गुरु चरणों का आश्रित वह नही मानता है अपने को तो उसे संसार की गहरी खाई में जाना ही पड़ता है । जो  साधक भक्त गुरु चरण आश्रय को ही मुख्य मानता है ,उसे गुरु भक्ति बचा लेती है । हम यह मान ले कि हम श्री स्वामी जी के जन है तो हमारे इस मानने से ही संसार मे धसने से बच जाएंगे और यह ठान ले कि  अपने प्रिया प्रीतम को प्रेम रस पान करना ही हमारा अनन्य धर्म है ,तो गिरने से हम बच जाएंगे ,अर्थात ऐसे कर्म करने है जिससे हमारे प्रभु प्रसन्न  हो । दौलत से खेलना ,परिवार सँग हँसना बोलना सब मेले के समागम समान है ज...

श्री प्रेम जू

*श्री प्रेम जू* स्वसुख को अग्नि में जलाकर ही प्रेम का  आलोक प्रकाशित होता है । पर जब बढ़ता है तो धैर्य और मर्यादाओं के बांध को तोड़ते हुये आगे बढ़ता है । पर निर्ब्याज अनासक्ति और विवेक के मार्ग के बीच से ही गुजरता है । ऐसी निर्मल निर्झर धारा ही प्रेम सागर में जा मिलती है और श्री कालिन्दी होकर प्रेम की अविरल सेवा में तन्मयता को प्राप्त कर लेती है । श्री वृन्दावन  🙇‍♂️🌷🙇‍♂️

संचय बिंदु

*संचय बिंदु* भक्त के अश्रु श्री हरि की अराधना के प्रेम जल  अर्घ्य बिन्दु है ,अतएव उन्हें श्री हरि के प्रसन्नतार्थ संचय कर रखना चाहिए उसे संसार के वियोग ,दुःख,दर्द कष्टो आदि में न खर्च करना चाहिए कारण वही बिन्दु अर्घ्य ,प्रेम सिंधु में मिलकर दिव्य प्रसन्नता का हेतु बन जाता है । संसार के हर्ष और दुख इसी कारण दोनो ही त्याज्य है , इनका आस्वादन ही अनर्थकारी है ,इसी का त्यागी ही वास्तविक त्यागी है रसोप्सना का पात्री है । जैसे मिट्टी के करुए में एक बार तेल भर लाये फिर उसे कितना भी माजा धोया जाए ,तेल की गंध और उसकी लहर पानी की सतह पर झिलमिला ही आती है ,ठीक इसी तरह से भक्ति रस मार्ग में सिवाए अपने एक स्वामी जू और बिहारी जू की ही निहारन बने , अतार्थ उनकी कृपा का निहारन बने  तो सबरे सुख दुख की सत्ता स्वतः मिटती जाती है ,उच्च कोटि की भक्ति  दोष अवगुण ठहरने नही देती ,पर जब तक ऐसी भक्ति प्रविष्ट नही हुई तब तक तो साधक को दोषों से सावधान रहने की सतर्कता बरतनी चाहिए , यह सभी सावधानियां श्री गीता जी सिद्ध भक्त के दिव्य लक्षण के बारे में वर्णित है । प्रयास ही तो हमारे अधिकार में है  और...

रसरत्नावली

रस राग रंग और रत्न इनका घनीभूत ललित माधुर्य सँग रसायन है      श्री कॄपा से जो दशा निरंन्तर इस अमृत पान में स्वयं को निमज्जित रखती है , वह शीघ्र ही अपनी तात्विक अनुभूति में प्रविष्ट होती है । जिधर से फूटी थी जिधर से निरझरा होकर  बही थी ,उधर की ओर की गतिमय होने लगती है ।    यह श्री ललित करुणा ही है कि ललित  ललायित भावनाएं रुकती नही ठहरती नही ,सदैब गतिमय रहती है अनन्त माधुर्य की ओर । जय जय श्री रस रत्नावली  श्री वृन्दावन  🙇‍♂️🙏🙇‍♂️

श्यामगौर झुमाइयाँ

*श्यामगौर झुमाइयाँ* पियप्यारी का परस्पर अनुराग ही झूला है । और निरंतर सँग बने रहना  निमिष मात्र भी असंग न होना यही इनका झूलना है । परस्पर का खिंचाव ही इनका सुहाग है वह झूलन की डोरी है । और  खिंचाव रूपी डोरी से बढ़ता स्नेहराग ही इस झूलन की गति को बढ़ावे झुमावे खिलावे । कैसे झुमाते झुमते ये झूलन झूले  कभी तो अँखियों के निहारन में  कभी तो परस्पर बाहों में भर जाने से  कभी तो श्रृंगारों के आपस मे उलझ जाने से , एक दूसरे में हिलमिल जाने से.. कभी तो परस्पर की किलकारियों में  प्रफुल्ल हो जाने से .. मधुर सुमधुर हर्ष वर्षण रस वर्धन केलि कलापो से .. ललचाते झुमाते मदन रंगों के तरंगों में  यह हर्षित आह्लादित हृदय की झूलती प्रेम किलोरियाँ मदन रङ्ग की  उछलती झुमाइयाँ । श्री श्यामा श्याम

अमृत वाणी श्रीभगवत रसिक जु

अमृत वाणी श्री भगवत रसिक                जू की  अगर साधना में आगे बढ़ना चाहते हो तो संसार मे किसी से नफरत नही करना  किसी का दिल नही दुखाना चाहिए अगर किसी के दर्द को सहलाने का मौका मिले तो हात भी नही खीचना  चाहिए। अपने साथ साथ सबके भीतर भी उन्ही एक परमात्मा का दर्शन करना चाहिए  हम उसके है ,सब उसके है और वो सभी के हितैषी है  वो हममें भी और सर्वत्र वयाप्त भी  इस एकात्म भावना रखकर जो आराधना करता है ,उसी के मठ मन्दिर में उसके हृदय श्री प्रभु विराजते है । हिंसा नफरत द्वेष दोष कपट यह वह खाई है जो भक्ति को खिलने नही देती  भक्त भागवत दास जी के अमृत वाणी  जो आगे चलकर   रसिक शिरोमणि  श्री भगवत रसिक जू कहलाये  यह नाम आप श्री के दादा गुरु द्वारा प्राप्त हुआ था   श्री भगवत रसिक अपनी जन्मस्थली  जू गढा कोटा (जबलपुर) मध्प्रदेश से पैदल श्री वृन्दावन आये थे ।

आह्लाद

*अह्लाद* अह्लाद से राग        राग में आह्लाद अह्लाद से ऋतुएँ        ऋतुओं में आह्लाद अह्लाद से उत्सव       उत्सवों में आह्लाद   अह्लाद से रङ्ग         रंगों में आह्लाद     अह्लाद से रस तरंग         उछलती तरंगों में आह्लाद .. प्रकृति के कोने कोने में रिसता आह्लाद  फिर भी इनके करीब रहकर नही अनुभव खुद को अपना स्वअह्लाद अहो दुर्भाग्य  प्रपंच में कितना धँसा फँसा  न जाने कौन ??? जिसका कोई अस्तित्व ही नही !! रो देती अक्सर .. मेरे  जीवंत की जीवनी  छुपा सा मेरा अह्लाद... *श्री ललित वृन्दावन*

कृपानुभूति और दशा

*कृपानुभूति और दशा* निरंतर प्रभु के चिंतन सागर में डूबा हुआ महा हटी मन, तब गल कर प्रभु के प्रेम को प्राप्त करता है । जब मन की कठोरता गल गल कर  पानी पानी हो जाये तब मन को गुरु की कृपा के चिंतन में रखना चाहिए ।  तीन बात जिसके जीवन मे प्रकट हो जाये उस पर इष्ट कॄपा प्रकट होने में  देर नहीं लगती, तब अकारण करुणा वरुणा बरस पड़ती है ऐसे शिष्यो पर , वह तीन  बात है , प्रथम - प्रेमी सद्गुरु की प्राप्ति दूसरी - उनके प्रति हमारी श्र्द्धा  तीसरी - वे हमें अपना ले     जब वे हमें अपना लिये तो फिर सहज लाडली लाल हमे भी अपनाने में पल भर देरी न करेंगे । उनके है पर उनका होकर जीवन को उतस्वित हो कर नही जी पा रहे ,    हृदय में आनन्द का अनुभव न होना या विरह दशा ही होगी या तो गुरु ईश सँग से छूटी हुई दशा होगी।      बस दशा ही का परिवर्तन करना है  वरना वे तो स्वयं हृदय के सरकार  है  पर न जाने कितनो कितनो को हृदय का  स्वामी बनाये हम बोझ लिए ढ़ो रहे ,तभी तो उनका स्वभाव प्रकट ही नही हो पाता । भय शंका कठोरता निराशा इत्यादि संक्रमक विपरीत...

प्रेम हर्ष

*प्रेम हर्ष* प्रेम का हर्ष ही वह हिंडोरा है जिस पर प्रेम झूलता है । प्रेम का हर्ष ,प्रेम का प्रेम में एकमेएक               होना ,परस्पर एकदूसरे में सराबोर हो जाना .. एकदूसरे में रङ्ग जाना भर जाना होरी हो जाना .. हर्ष ,रसों की होरी है प्रेम के रंग की  श्री वृन्दावन 🙇‍♂️🪷🙇‍♂️

मधुर होने की लालसा

*मधुर होने की लालसा* भीतर मधुरता ही मधुरता  भरी हो तो श्री  माधव मधुरता चखने क्यो न आवेंगे ... मधु का पान भ्रमरी श्री माधव जू की भोग्य वस्तु है । अस्तु  मधुर माधव की मधुता वही प्रकट है  जिधर हृदय ही मधु हो जावे ..    अतः  जीवन मे मधुरता को प्रयास कर सावधानी पूर्वक भरे चंचलता ही पात्रका छेद है । कैसी चंचलता  जड़ता की चंचलता  जड़ मन की अवस्था  स्थिर ,एकाग्र हो कर रुचिपूर्वक मधुता को ग्रहण नहीं कर पाती ।  विचारों की चंचलता ही मन की जड़ता है । एक भी ललित नाम को मधु वत पिया जाए नित्य नित्य तो सहज ही मधुरता भरेगी ।  यह ही कारण से  स्त्रोत नामावली हृदय को मधुरता से भरने की  दिव्यतम औषधि श्री आचार्य जू द्वारा  पर बुद्धि की चंचलता इन्हें  बिन रुचि से  पाठ या नियम समंझ कर  करती है तब उन्हें सुख न हमे उमंग बने । अगर ये  नामावली हमारी प्राण बन जाये और सेवा रुचि वश एक एक नाम का स्वाद भरे  तो वही रस गुण भरेगा जो उन  नाम जू में ओतप्रोत है । जब स्वयं को कोई पुलकित तरंग अनुभव नही होगी तो कैसे सोच सकते ह...

सौंदर्य और बोध

*सौंदर्य और बोध* प्रेम वान चित्त सदैव सरस् होता है ,उसके हृदय में कभी घृणा उत्तपन्न होती ही नहीं ।प्रेमी को ही सम्पूर्ण विष्व सौंदर्यमय दिखता है ,क्योकि श्री भगवान ही सम्पूर्ण सौंदर्य के अधिष्ठान है और सम्पूर्ण विश्व उनके सौंदर्य किरणों से आलोकित है ।अतएव सर्वत्र सौंदर्य के दर्शन में सहज ही प्रेमी का चित्त रस विभोर रहता है ।नीरस चित्त में इसका स्पंदन उठता ही नही कारण उसका अंतःकरण । प्रेम का स्वाद सौंदर्य है ,दोनो ही एक दूसरे के प्रति आकृष्ट है ,और इनकी एकमय  स्तिथि श्री प्रेम धाम श्री वृन्दावन के नव निकुंजो में है ,जिधर दोनो एकरस हो जाते है । श्री वृन्दावन  🙇‍♂️🪷🙇‍♂️

सहज चिंतन

*सहज चिंतन*     दुख और क्लेश में क्या फर्क है        फर्क बहुत गहरा भी और ज़रा सा भी ,दुख में चिन्तन बनता है प्रभु का पर क्लेश में प्रभु चिन्तन असम्भव है , कारण क्लेश मोह द्वारा उत्पन्न होने मन को दूषित और व्यथित कर देता है ,क्लेश स्वयं के जगत के माने हुए असत  सम्बन्ध से आता है अतः क्लेश मन की उपज है मन से ही मोह है ,और मोह में असत्य का ही ध्यान और चिंतन बना रहता है ,क्लेश प्रारब्ध द्वारा नही अपितु वर्तमान की उपेक्षित इक्षाओ और  कर्मो का परिणाम है ,सो जीवन  में क्लेश आता है तब सहज  आत्मिक प्रसन्नता और विशुद्ध चिन्तन छूटने लगते है । यह क्लेश है  प्रपंची है जो राक्षसी सम्पत्ति है  आसुरी प्रभाव है मनुष्यता पर । पर दुख तो प्रारब्ध के भोग है जिन्हें सहज भोगने पर वह कर्म क्षीण हो जाता है और चेतना नवीन हो कर अग्रसर करती है ,मुख्य बात दुख के काल मे पीड़ाओं से भरा हृदय द्रवित होकर प्रभु की शरण हो गलित होकर पुकारता है । दुख की पुकार तीव्र होती है प्रभु को स्पर्श करती और उनका हमे भी स्पर्श कराती है अनुभव कराती है की वे श्यामा श्याम, वे नाथ ...

रसप्रेम सीढ़ियाँ

भाव ही पक कर प्रेम  बनता है  प्रेम ही पक कर रस बनता है  भाव उपलब्धि की सीढियां  1 श्र्द्धा 2 सत्संग 3 नियम  4 निष्ठा  5 अनर्थ की निवृत्ति  6  रुचि  7 आसक्ति  8 भाव  9 प्रेम 10 रस  अतः रस की प्राप्ति जिसे हो चुकी है  वह भोगों के लिए क्यो भागेगा

क्षमा से भरा हृदय

क्षमा से भरा हृदय और करुणा से भरा भाव  यह ही आत्मिक प्रसन्नता है  जिसका ऐसा स्वभाव है  उसको न कोई बुराई स्पर्श करती न  किसी की बुरी भावना । श्री राधा 🙏🌷🙏

चिंता शोक और भय

चिंता शोक और भय  यह कर्म फल है आये है चले जायेंगे  इसीलिये इनको स्थान न दे  ठीक उसी प्रकार सुख सुविधा लाभ  यह भी कर्म परिणाम है जो स्थिर नही रहेंगे  यह भी जाने वाले है  इनका भी जीवन मे आदर न हो  यह सभी वृत्तियां है जो भजन रस को बिखेर देती है इनके चिंतन बनने पर , इनके स्पर्श से भी किया गया भजन नष्ट हो जाता है और स्मृति का नाश होता है । यह वृत्तियां तब तक परेशान करती जब तक स्वयं संसार से मोह है , अतः मोह के नष्ट होने पर ही ,प्रेम भक्ति एक धारा में बहती है तब वही प्रेम रस में रूपान्तररित हो जाता है । तभी गीता जी मे कहा है कि  नष्टो मोहा स्मृतिलब्धवा  अतार्थ  मोह के नष्ट होने पर  स्वयं की स्मृति सहज सुलभ है  जो पढ़ने सुनने की वस्तु  नही अपितु  स्वयं की अनुभूति पर है । श्री राधा 🙏🌷🙏

भक्ति देह की वस्तु नही

भक्ति देह की वस्तु नहीं     पर जब देह में प्रकट होती है  तब अपना  क्रियात्मक स्वरूप भी दर्षन कराती है  भक्ति का सम्बंध भाव से है  भाव का सम्बंध भगवान से है  भाव शून्यता  कभी भक्ति नही होती  महज एक सेवा अभ्यास  पर निष्काम अभ्यास भी भाव राज्य तक ले ही जाता है । क्योकि अभ्यास से सब सुलभ है श्री गीता में भी अभ्यास योग पर ज़ोर दिया है । अतः  प्रभु के लिए किया अभ्यास भी भाव से कम नही । अतः  जब तक जीवन है भजन का अभ्यास बना रहे । यह ही जीवन का लक्ष्य ।। श्री राधा 🌷🌷🌷