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Showing posts from June, 2021

सहज हो कर भजन बने

सहज हो कर ही भजन बने माई री सहज जोरि प्रगट भई.....  सहजता में सहज जोरि प्रकट है, सहज ही होवे तो सहज जोरि हृदय में प्रकट होवे ... जो सहज हैं वह ही सहचरी हो सके।असहज हृदय में कैसे सहज जोरि का सुखवास हो .. निश्चित वे सभी में सभी उनमे ,पर उनकी मिठास का अनुभव तो सहज होने पर  ही बने ,सहज को सब सहज है।   असहजता जीवात्मा का स्वभाव । सहचरी को तो हर हाल सतर्क रहना है सहज रहना है उनके उत्सव सेवा हेतु  सहज होकर भजन रंगने लगता हैं  और असहज स्थिति भजन को ही चौपट कर देती है।सबसे बुरा संग स्वयं हमको हमारा है।मन बुद्धि में अन्य का दोष दर्शन ,यह कुसंग हैं  और सिर्फ़ मात्र प्यारी प्यारे की बातों में रुचि रखना यह ही सत्संग है। जिधर प्रिया प्रियतम की चर्चा कम और मैं की प्रस्तुति अधिक है वह कुसंग ही है। श्री वृंदावन

प्रेम की सारँग दशा

प्रेम की सारंग दशा श्री विपिन                   महा महोत्सव  सखी ,जिधर की लताएँ  पताएँ तरु पल्लव भी सारंगित हैं ऐसा श्री वृंदावन धाम महा महोत्सवो का कुंज है।    यह निभृत स्वभाव है श्री विपिन का की सहज श्याम तमाल की कुसुमित ललित लताएँ सहज आलिंगित परस्पर आबद्ध है । इनकी उरझाई ललना लाल की बंकिम प्रीति को और और मधुरित ललित और उत्सवित करती ,नव नव वलित विलसनो में ,हुलसनो में ..नवीन उत्सवों के  त्रिभंगित प्रकम्पनो में ..रुचिगत ऋतुएं मधुरांग विलासो में सज सज कर परोसती ,पोषती ,सजाती स्नेह के रसों को ,रसमग्न कर भीगा जाती और पंकिम होने को ...झुमाती और और बिहरण में स्नेह मदिरा हो जाने को ..    कुंज भवन में सखियों का समूह ,प्रेमी युगल के क़ेलि कौतुक दर्शन हेतु चकोर वत तरसते सरसते हैं ..        परस्पर प्रेम रंग की सारंगाई में श्री विपिन का रोम रोम हर्षित हो हो अंगड़ाई भरे ..लहराये और तरंगित हो हो युगल को स्पंदित करे और और फ़ूलन खेलन खिलन मिलन रुचि को और बढ़ाने हेतु  यह श्री वृंदावन धाम का सारंग...

युगल आरती

युगल आरती आरती उतारूँ पियप्यारी तोरी  आलस निवारू श्यामा श्याम तोरी ... आरती हरत परस्पर तन की आरती कीजै सुंदर युगल वर की ...  सुरती अंग अनुरागी रंग   परस्पर रूचि अलबेली संग की ... सुफल मनाए भाग देखि नेक सखियाँ श्री बिहारिणी बिहारी के नव विलास सुधा सुखकर की .. श्री वृंदावन

श्रीहरिदास नाम

श्रीरस नाम श्री हरिदास श्री हरिदास नाम श्री हरिदास नाम  जय जय मधुरामृत रसीलो जाम ..   श्री हरिदास ही भाव    श्री हरिदास युगल सुख सेवा चाव.. श्री हरिदास ही रस युगल स्वभाव  श्री हरिदास ही निर्झर ललित रस बहाव ... श्री हरिदास ही ललित लतानि कुंज  तामे खेले युगल सुख पुंज .. मोहिनी मोहन विलासी उर पर  विलसै जो श्री हरिदास आश्रय एक पल न बिसरै.. श्री हरिदास ही प्रेममयी दशा विनोद  जामे उपजे नव नव क़ेलि प्रमोद.. श्री हरिदास नाम रसिकन जीवन प्रीती उपजे उज्ज्वल प्रेम ,अद्भुत प्रतीती .. श्री हरिदास नाम सर्वोपरी प्रेम धाम    कहे श्री हरिदासी धर्मी .. कृपा जो होई  श्री हरिदास नाम की    तो अति बड़भागी होवे प्रेम रस मर्मी.. श्री युगल का यह सुख मय नाम  मधुर मधुर श्री रसीलो जाम  श्री हरिदास नाम श्री हरिदास नाम ..   श्री हरिदासो विजयतेतराम

ठान में मान

ठान में मान      श्री प्रियाजु का हित हेत सुखद विलास श्री लाडली जू के आकस्मिक एवं अकारण मान का अवलोकन करती कुशल सखी कहती, श्री प्यारी से :- प्यारी तू अति श्यामा  लाल उर अभिरामा.. नित्य सुख सदने प्रीतम प्रेम अनुकूले  फिर काहे तू रूसने का स्वाँग रचे .. जोई जोई प्यारों करे प्यारी सोहि तोहि भावे  फिर व्यर्थ क्यों मान बढ़ावे .. प्रीतम के हेत ,प्रीत के हित ,न्यारी तेरो यह है सब सुखद स्वाँग    प्यारी तू अलबेली  बैठी मान कुंज में बिना सोच विचारे .. तेरो मग जोवे लाल बिहारी राधा राधा अकुला -अकुला ,चिहारे .. प्रेम की परिपाटी तुम जानो प्यारी  करौ व्याकुलता का निदान ... करहू कृपा दान प्यारी  लियो कण्ठ लगाई अपनो प्राण सुजान .. और करिहौ जो जो रुचै ,पर तजि दिजौ यह मान .. तुम जीवन भूषण पिय की तुम ही निज प्राण .. सुनत सुखद वचन कुशल सखी के  श्री प्रिया में भरी प्रेम उड़ान .. दौड़ी गईं कुसुम कुंज में  स्नेह रस भयौ और सुहान .. स्नेह रस भयौ और सुहान शीतल भये व्याकुल रसिक सुजान .. पायो रस में रस ने सुखद विश्राम        रस का र...

माया का बोध

माया का बोध जब जब हमें उनसे छूटने का बोध होगा  यह बोध जीव भाव माया में होगा .. वास्तव में वे हम में ..और हम उनमें  वृंदावन भी हृदय में  पर अभी हृदय  वृंदावन को अपने अंदर न देख न सजा पाया है  यह पीड़ा भी तभी तक है जब तक हम उनका सुख नहीं रचते  तभी तक माया का प्रवेश है।   श्रीश्यामाश्याम

बहकना और बहलना

बहकना और बहलना हम बहक गए तुम्हें ढूँढने के लिए   हम बहल गए तुम्हें अपने ही अंदर अपना ही वजूद जानकर ...

झरित श्रृंगार की वेदना

झरित श्रृंगार की विरह वेदना        और उम्मीद का सुख यह मजबूरियाँ हैं या मेरी चाहत की हार  या सिर्फ़ एक ख़ुमारी का अहसास .. हार भी गयी होती तो तसल्ली थी  पर इधर तो और इशारों पर जमी मेरी कश्ती थी .. ख़ाक हु मैं  पर बुझने की सोचती रही  चली ही कब थी .. जो तुम तक पहुँचने की उम्मीद कर रही .. पर यह उम्मीद ही तो सम्पूर्ण जीवन को किसी आस मे जी लेती है  कि कभी तो मिलेंगे .. कभी तो खिलेंगे .. कभी तो वे अपनाएँगे  ... फिर उन्हें हम जिएँगे .. कोई न कोई श्रृंगार बन कर उनका फिर खिलेंगे ..फिर महकेंगे  पुनः मिलेंगे.. पुनः सजेंगे .. एक झरित श्रृंगार श्री हरिदास

आरती सजनी जु

आरती सजनी जु लोलुप्ता जगाने हेतु ऊष्णसजनी का न्योता आठों याम सेवा में रहती       उष्णिमा रजनी श्री अग्नि सजनी  झूम झूम बलियाँ उतारे        नील पीत को ललित रंग में घेरे  आलस निवारे श्री आरती रमणी भोर साँझ या मध्य मधु काल ..   कहती झूमो खेलो हेलो मेरे युगल रंग गुलाल ..   फहर फहर लहराती इठलाती..   नाट्यकला का रस बिखरती      उछाले युगल  प्रेम ज्योति .. आर्त उतारने के बहाने  नव नव उत्साहों की लोलुपता जगाने आती प्यारी उष्णसजनी ... प्रेम के रस में प्रेम की अग्नि होकर स्वागत करती प्रेम माधुरी  स्नेह रसों का न्योता देने आती  सजाती प्रीत की अग्नि सजनी ... श्री आरती सजनी ... श्री हरिदास🙏🌷🙏

ख्याल और प्यार

ख़्याल और प्यार जब तुम संग न हो तो तुम्हारा ख़्याल संग हैं .. जब तुम संग हो तो फ़िर तुम्हारा प्यार संग हैं ..    ख़्याल ए संग में हम कितने एक हो जाते हैं ..    और प्यार के संग में सिर्फ़ प्यार रह जाते हैं ..   पास हो या दूर बात नज़र के तसल्ली की हैं .. दर्शन तो बंद आँखो में ही हो जाता हैं  बात पूरी दिल्लगी की हैं ..

प्रीति रस रमणा

प्रीती ..रस ..रमणा      (प्रीती का गलित घन विलास) देखो स्नेह की बूँदे लेके रस शिशु के पोषण हेतु  आइ प्रीती घन घमणा.. उमड़ उमड़ कर बहाती  प्रेम रस रिसाती    देखो यह दामिनी रस वर्षा ..प्रीती रस रमणा.. स्नेह रस की वृद्धि हेतु ,रस व्याकुलता उपचार हेतु , भिगाती शीतल झरती रस जमुना ... प्रीती रस रमणा ...’ मौज़ों की रवानी में  भीगी भीगी ख़ुमारी में इठलाती यह प्रौढा नव रसना .. झूमते श्रृंगारो से ,बहकते इरादों से , महकाती ,सजाती ,स्नेह रस विलासों को ..प्रीती रस मग्ना.... हाँ सखी , न मैं ,न तुम ,न वो ,न ये  मौज ही मौज बहा.......     बहा ले गयी संग अपने यह सरसीली  प्रेम अर्चना ...प्रीती रस रमणा .. सम्पूर्ण विलासों को उनका हित लौटाने  प्रेम के रोम रोम का अभिषेक करने , आइ ,देखो दामिनी घन घमणा..श्री प्रिया रस रमणा .प्रीती रस वर्षा ...   श्री हरिदास

दिलकश

काश इतनी दिलकशी मुझमे होती     की तुम्हारे एक एक नाम को मैं जीती  कितनी मजबूर हूँ अपनी चंचल हस्ती से     पास तुम हो मेरे ,और ढूँढती तुम्हें दूर मैं बस्ती में ..

ललित निवेदन

🍂🍂🍂☘️☘️🍂🍂💐           ललित ..निवेदन सखी हो ,या फ़ूल हो कि फूलों का श्रृंगार   झूम हो ,की झूमका, या प्रेम सुखों का बिहार   प्यार हो या उत्साह या हृदय का मधुर विलास          मेरी कुमुदिनी  मेरी फुलिनी मेरी नन्ही सी प्रेम उड़ान उमड़ती उमगती रहो ऐसे ही भरती रहो मुझमें  रंग रस व्यार  करती रहो ऐसे ही ललित ललित तृषाओ का मेरे रोम रोम मे नव नव उत्सवों का संचार 🌷🌷🌷    श्री हरिदास

सखी तुम

सखी तुम सखी  तुम ,युगल सुख से ,युगल संगिनी कहलाती हो एक दूजे के मन की सखी बात हो तुम .. विभास हो तुम बिहार का विहाग हो तुम  प्रेम विलास बुन बुन  उन्हें नित्य नव नव उमंग उत्स धराती तुम  नय नव श्रृंगारों को लेकर ,सखी तुम उन्मे श्रृंगार विलास जगाती हो  सखी  तुम ही बसंत तुम ही पावस , केलि कलाओं के विकास विलास हेतु नाना भाव हो कर आती सखी तुम .. युगल उन्मादिनी ,श्री युगल का उन्माद बढ़ाती तुम .. तुम ही पावस तुम ही शरद   तुम ही नव नव तरुण पल्लव में खिली कुमुदिनी कहलाती , तुम ही सुगंधा तुम ही राग ,प्रेम केलि के कोक कलाओ से उनका सुहाग सजाती ..सखी तुम  तुम बहती हो उनसे सेवा होकर ,अनुराग राग होकर ,उनका मज्जन विलास होकर वृंदावन की ओर....   और फिर तुम ,झरती अनुग्रहित चूर्णिका ..पुनः वृंदावन से नवीन और नवीन रसमयी सेवा बन कर..आती सखी तुम ... उनका नवीन विलास बन कर झूमती संग संग उनके तुम .. श्री वृंदावन का निभृत चिंतन हो तुम ,प्रेम रोगन सुरभित सुगंधित उपचार होतीं हो ,सखी तुम .. युगल संगम के प्रेम झरन की उज्जवल ओस की बूँदे हो ,सखी तुम.. उनका सघनतम से सघनतम...

रँग का रमण

रँग का रमण युगल बिहार (रस)और राग रस से राग और राग से रास  रास में राग और राग में रस    रस राग और रास ...    जिधर से भी स्पर्श करो ..ललिता ललित स्पर्श हैं । युगल केलि रागों को छेड़ो तो भी ललित रस के भावों का अनुभव  युगल रस बिहार का चिंतन मनन हो तो भी ललित बिहार के रागों मे सहज रमण.. रस का विल्सन उछ्ल्न और उसका उद्दरेक ही राग हो गया    राग ही रास में बदल गया रास से राग  राग से रस  रस में रंग का रमण रस गमन करते करते स्वयं हुआ रास और रास का रस और बहा तो स्वयं खिला अनंत अपनी ही प्रीतियों का राग  और राग से फिर अपने रस स्वरूप में  अपने रस रंग के रमण में  यह नील पीत का रस रमण  रचे अनंत तरंगें.... हर तरंग का रंग हैं  हर रंग का रस हैं  और रस का राग है हर राग में खिला युगल रस तरंग है....   रस  ....से....रास...में...राग और राग से पुनः युगल रस रंग तरंग  प्यार से बिहार ..   बिहार से राग प्रकट होते  सो निश्चित की राग  से सहज बिहार दशा भी फिर खिले  खिले खिले और मिले मिले  यह राग रागनि...

नील नील और उज्ज्वल

नील नील और उज्ज्वल     प्रेम गगन में युगल मगन        ........................................ (मल्हार विलास ) नीले नीले प्रेमाकाश में उज्ज्वल चमकते प्रीती के बदरा  घूम रहे उमंग में प्यार में बरस जाने को  नील मे सफ़ेद धवल यह रंग हैं उसके अपने ही प्यार का  अपने प्यार में बिखर बिखर फिर सिमट     सिमट कर बिहरने का    इसके बिहार काल में जो प्रेम की       ध्वनि फूट पड़ती हैं स्वतः वह मिलन के आनंद की गरजना हैं घन से प्रकट दामिनी है .. प्रेम ऊर्जा है मिलन की .. बिहरण काल बदरा का अपने नील आकाश में चमकना ..गड़गड़ाहट ..इसके प्रेम के भार में स्पंदित ,प्रेम आंदोलन में झूमना है प्रेम समारोह से आंदोलित होती हुई बदरा  प्रेम की उत्तरेक दशा में मचलती हुई , जो स्नेह मदन रस सम्भाल न पाती वह अतिरेक विलास की बूँद पावस रस हो हो कर धरा पर बरस जाती है .. बरस जाती है ... यह पावस विलास लेकर घनदामिनी धरा पर आती है     और और विलसित विलास को विलसाने के लिए  सम्पूर्ण प्रेम हुलास में हुलसित और हुलसाने के लिए  उ...

पावस रस

पावस रस प्रिया प्यारे का स्नेह रस हैं  इस रस से अनुरंजित जो राग प्रकट होता है वह मल्हार हैं  पावस रस का राग मल्हार     यह पावस ऋतु ..प्रेम विलास हैं श्री युगल का और इसकी राग हृदय का आह्लाद प्रेम का मोद बढ़ाती हैं।

प्रेम का श्रृंगार राग

प्रेम का श्रृंगार हैं राग  राग से पोषण हैं प्रेम का  और पुनः अपने राग से पोषित प्रेम का हैं और नवीन नवीन संचार  प्रेम में राग भरा हैं  इसी लिए प्रेम सहज नवीन हैं और  इसीलिए जीवंत हैं  और जीवंत ही  स्पंदित हैं ..

युगल केलि

युगल केलि ..सखी उत्साह नील के आग़ोश में  उमड़ उमड़ कर  बलखाती ..इतराती.. नील नील उल्लास में  छनक चमक कर लहराती हुलसाती  सागर की लहर  श्याम की श्यामला श्री प्रिया .. संग में संग से भीगकर  प्रेम के वेग मे बह जाती  फिर संभलती.. पुनः डूब जाती     फिर उत्सव कलरव हेतु  नील नील आगोशो में मचलाती  आती .फिर जाती  यह सागर की लहर ..श्री प्रिया लौट ..लौट  प्रेम मद रवानी में मदन रंग भर फिर डूब जाती ...श्री प्रिया ... यह सागर का उसकी लहरो से संग नील में उज्ज्वल का रंग       प्रेम उत्साह हैं     युगल क़ेलि उत्साह हैं   इस उत्साह की प्यासी श्री सखियाँ

जननी को पीड़ा

🙏श्री कुंज बिहारी श्री हरिदास 🙏              जंननी को पीड़ा                       और                जीव को भय जननी को भय न हैं  भूमि को भय न हैं  कारण सखी .. क्योंकि उसे पाने की नहीं  पर न दे पाने की पीड़ा हैं  न खिला पाने ,न महका पाने की ,न विकसित कर पाने की पीड़ा हैं ...  अपना अमृत न पिला पाने की पीड़ा हैं .. यह पीड़ा को ही तृषा कहते हैं  यही मूल पीड़ा हैं     इसे आध्यात्मिक पीड़ा ही समझे  यह जीव के जननी होने का प्रमाण हैं  उसके शुद्ध अस्तित्व का प्रमाण हैं  जननी हीं प्रेम कर सके  जननी ही स्नेह का पोषण का सके  जीव का जननी हो जाना  उसकी आध्यात्मिक उच्चतम गति है  आगे के विकास के लिए  आत्म विलास मे विकसित होने के लिए  जो जीव जननी हुआ है  वह ही सहज सेवायत हैं  क्योंकि सेवा उसका मात्र स्वरूप रह गया यह सुंदर सेवा मार्ग सेव्य में लीन कर देता है पर सेवा सिर्फ़...

मंगलमय दृष्टिकोण

मंगलमय दृष्टिकोण आज की शुभ हितमय बेला पर  एक सुमन भाव निवेदन 🙇‍♀️ श्री सखियों  पाने की उम्मीद चाहे भजन से ही स्वयं के लिए क्यों न हो उत्साह का ह्रास करती है  लालसा मंगल हो फिर भी स्वयं के लिए होवे तब भी बाधा उत्पन्न करेगी  सो क्या मिलेगा क्या पाएँगे  यह न सोचकर  क्या सेवा निवेदन कर पाएँगे  क्या देने को मिला  है  कितना मिला हुआ दे पाएँगे इस पर हम चिंतन करे  स्वयं के लिए कोई चिंतन न क्योंकि हम स्वयं धन है अपनी धनाश्री के सेवा रूपी धन  इसी धन की सेवा करनी है पर स्वयं के लिए इस सेवा से कोई पारितोष  की भी आशा न हो  तो हम कृपा मे भारित होती जाएँगी  कृपा से कृतज्ञ हुई सखी अपने पियप्यारी की हिण्डोरा उनका हिय सुख होती हैं  जय जय श्री हित हरिवंश जु  जय जय श्री ललिते  जय जय श्री वृंदावन

युगल प्रेम रस रवानी

*युगल प्रेम रस रवानी* (वर्षा ऋतु -कुंज केलि विलास) सखी ,पावस ऋतु छा रही हैं और यह ऋतु सहज ही प्रेम की प्रसन्नता का ब्यार लेकर आती है।    श्री वृन्दावन की हरी भरी भूमि देख देख ..कुंज निकुंजो का पुष्पों से लदा यौवन चातक ,पपीहे , मोरों इत्यादि पंक्षियों का मुदित कलरव और उनका इस ऋतु के आगमन पर उमंग भरा नृत्य .. श्री घन दामिनी की चमक , धमक ..एवं वर्षा की  शीतल शीतल धीमी धीमी फुहार,श्री युगल के हृदय को केलि-कलोलित और अति प्रसन्न करती हैं। सखी ,यह शरारती मतवाली  ऋतु दोनो के हृदय में प्रेम का मज्जन कर रही मानो..दोनो के स्नेह को अब केलि विलास में प्रकट करने आतुर ..यह प्रेमातुर वर्षा ऋतु।दोनों को पता ही नहीं चला कि कब धीरे से यह पावस ने उनमें मदन की सींचना कर दी हैं और रस विदग्ध नागर और रस प्रदायनी नागरी में राग मल्हार को उनमें प्रकट कर ..उनके स्नेह रस को और और उन्मादित करने लगा ..    सखी ,फिर इस प्रेम रस रवानी में दोनो युगल फ़ूलने .. खिलने लगे ।क्या कहा जाए उनकी यह पावस प्रेम दशा .....युगल के मन अब मिलन को हर्षित हैं और उन्मत्त प्रेम अनुराग रस में भींजते जाते हैं ।प...

न हम न तुम

*कि न तुम न हम* 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 सोचते सोचते हम तुम हो गये    तुम हम हो गए  डूबे इतने की न तुम न हम  एक अहसास भी न रह गए    शेष शेष मात्र प्रेम रह गये      डूबा तो  स्वयं को प्रेम पाया  न तुम न हम    प्रेम हीं हम प्रेम ही तुम .. प्रेम में सिवाए सोचने के हैं क्या   नयन में नयन देख सोचते हैं   अधर अधर भी मिल कर सोचते हैं    रोम रोम उलझ उलझ कर सोचते हैं  सोचते हैं  मिलते हैं  और सोचते हैं मिलते हैं  और और अपने प्रेम वपु में खोते हैं.. सुन री सखी .. तुझसे ज़्यादा सँग यह तेरा ख़्याल है  तुम थे साथ उससे और पास यह तेरा ख़्याल है... *श्री हरिदास*🙏🌷

प्रेम सिद्धांत

प्रेम सिद्धांत  (प्रेम की देहरी पर प्रेम ही रहता है) प्रेम की तहज़ीब वो न समझे     हम ढूँढते रहे गहराइयाँ  वे लफ़्ज़ों से चंद अल्फ़ाज़ खेल गये ......प्यासे को मतलब ही क्या पात्र के चमक से ..उसे तो पात्र की गहराई चाहिए अपनी हलक को गीला रखने के लिए ..    सखी ,प्रेम की सेवा में सिद्धांत भी बाधा नहीं बनता ..स्वयं  गल जाता जिधर प्रेम स्पष्ट हो जाता .. प्रेम भीतर से उछला प्रेमास्पद पर रँगीला रसीला गीला मधु लेपन है , सो सिद्धान्त सिद्धान्त केवल स्थूलता को गलित करना चाहता । जो नित्य सहज गलित है वहाँ प्रेम है , और प्रेम का सिद्धांत है प्रेम उल्लास का उत्सवित विलास मात्र ।  सारे सिद्धांत - मार्ग प्रेम तक पहुँचाने के लिये ..प्रेम देहरी पर तो प्रेम ही रहता हैं , साधना प्रेम की ओर की यात्रा है , प्रेम की अपनी साधना में प्रेम का सेवा - सुख होकर वर्द्धन ही है । सखी,प्रेम का न कोई गुरु न कोई शिष्य प्रेम में न शिष्टता न विचार  प्रेम में बस प्रेम भरा अहसास , प्रेमी सिर न झुकाता अपने यार के दर पर ,उसे तो नज़र मिलाना ही रास आ गया ,नज़र मिल जाये और हम याद रह...

कोमलता पर कोमलता का श्रृंगार

कोमल पर कोमलता का श्रृंगार  राग पर बरसती राग  आह ..... आह ...... सहज जैसे मल्हार जु प्रकट हो सेवा दे रहे हों.... संग उनके उनकी संगिनी बरसती बूँदो का किलोल ,खेलती झरित झरनो का मृदुल शोर ..... प्राण पर बन आए सखियों के ..!! युगल हुलसन को व्याकुल ... यह झूमती विलासिनियाँ  यह ध्वनि नहीं बस ... यह पुकार उनकी की ..झूम जाने की रुचि और ..और ..और .....

नवीन मुस्कान

नवीन मुस्कान    पगली मुस्कान सदा नवीन होती है।एक मुस्कुराहट ही तो है जो नवीनता लेकर आती है।   हाँ सखी ,जानती क्यों ?? नवीन वे ,नवीन  ही उनका ख़्याल  नवीन उनका रंग रंगाव  नवीन स्पर्श करती चेतना को दे जाए अनुपम  नवीन अहसास  नवीन उनकी माधुरी  नवीन नवीन साथ .....   उसी नवीन संग  से खिलती नवीन मुस्कान ..हर दिवस नवीन सखी ,जव नवीन का हो दिल में ख़्याल.... एक नवीन ख़्याल ,जो दे जाती नवीन मुस्कान ..... एक मुस्कान ही तो हैं जो सदा नवीन नवीन होती ,क्योंकि वो नवीन से मिल कर आती , नवीन से छूट कर आती ..... पगली तेरी नवीन मुस्कान... तेरे शब्दों तेरे ख़्यालों में बिखर कर आती ,उनकी मीठी मीठी बातों को लेकर आती । ............ ज़िंदगी मुस्कुराना चाहती है    ज़िंदगी खिलना चाहती है इसीलिए ज़िंदगी तुम्हारे लिए कहीं से प्यार चुरा कर लाती है। प्यार ही से मुस्कुराहट है   प्यार ही से जीवन में हर नवीन अन्दाज़ हैं  इस अन्दाज़ में ज़िंदगी जीना चाहती प्रेम ही प्रेम हो जब ख़्याल प्रेम हो      प्रेम का ख़्याल ही तो मुस्कुराता है ..... ...